जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद

मधुशाला में
जा के हाला पिये
जगहँसाई
व्याकुल प्रिय
घर भूत का डेरा
रूठा जीवन
यकृत नष्ट
दृग छाया अँधेरा
सब बेकार
देशी-विदेशी
जीवन शत्रु हमीं
अधरप्रिया
जीवनशैली
हर आयुवर्ग में
फैला है विष ॥

मधुशाला में