मनीष कुमार शुक्ल ‘मन’ लखनऊ –
बहुत भड़का चराग़-ए-इश्क़ बुझाए जाने से पहले |
ग़ज़ब के हर्फ़ लिख डाले मिटाए जाने से पहले ||
सम्हाले दिल को रखना तुम कहीं ये टूट न जाए |
हँसाया ख़ूब जाता है रुलाए जाने से पहले ||
मुक़द्दर का भरोसा क्या आसमां दे ज़मीं छीने |
उठाया ख़ूब जाता है गिराए जाने से पहले ||
मेरी वो बात करता है मुझे डर ये सताता है |
किया अब याद जाता है भुलाए जाने से पहले ||
यकीं रखना बहुत उस पर कभी ये भूल न जाना |
अज़ल तक ले वो जाता है बचाए जाने से पहले ||
पता है रीति ग़र तुमको अमल में लेके भी आना |
सन्देसा भेजा जाता है बुलाए जाने से पहले ||
भला दिल को कहूँ भी क्या बहुत नादान होता है |
हसीं सपने सजाता है सताए जाने से पहले ||
सुनो ‘मन’ मैं बताता हूँ हकीक़त इस मुहब्बत की |
जड़ें गहरी जमााता है हटाए जाने से पहले ||