जहाँ कम्पोजिंग के अक्षरोँ के ख़ाने मे नीचे ‘बारूद’ और ब्लॉक के स्थान पर ‘बम’ रखे जाते थे!

क्रान्तिकारी गणेशशंकर विद्यार्थी के बलिदान-दिनांक (२५ मार्च) पर विशेष प्रस्तुति

योँ तो क्रान्तिधर्मी गणेशशंकर विद्यार्थी ने कई समाचारपत्र-पत्रिकाओँ मे लेखन और सम्पादन किया था; परन्तु वे स्वयं के लिए जैसी आज़ादी चाहते थे, मिल नहीँ पाती थी। यही कारण था कि उन्होँने उन्मुक्त पत्रकारिता करने की ठानते हुए, कानपुर से एक उग्र समाचारपत्र सम्पादित करने का विचार किया और उसे क्रियान्वित भी कर दिखाया। शिवनारायण मिश्र उसके मुद्रक थे। गणेशशंकर महाराणा प्रताप के कर्त्तृत्व से इतने प्रभावित थे कि अपने समाचारपत्र का नामकरण भी ‘प्रताप’ कर दिया, जोकि शिवनारायण मिश्र, नारायणप्रसाद अरोड़ा और यशोदानन्दन के साथ मिलकर एक हिन्दी-साप्ताहिक समाचारपत्र के रूप मे ९ नवम्बर, १९१३ ईसवी से कानपुर से प्रकाशित होने लगा था। उन्होँने प्रथमांक के सम्पादकीय मे लिखा था, “यह पत्र राष्ट्रीय स्वाधीनता-आन्दोलन , सामाजिक-आर्थिक क्रान्ति, जातीय गौरव, साहित्यिक-सांस्कृतिक विरासत के लिए संघर्ष करेगा।”

उस समय ‘प्रताप’ की प्रसार-संख्या १२ से १५ हज़ार तक पहुँच चुकी थी, जिससे उसकी लोकप्रियता का अनुृमान लगाया जा सकता है।

‘प्रताप’ की विज्ञापन-नीति एक आदर्शमयी पत्रकारिता की प्रतिष्ठा करती दिख रही थी। ‘प्रताप’ मे उन विज्ञापनो को स्थान नहीँ दिया जाता था, जिससे समाज मे कुरीति, बुराई और अनैतिकता का संदेश न जाये। उसमे किसी राजा, उद्योगपति और अँगरेज़-शासन-प्रशासन का विज्ञापन नहीँ होता था। ‘प्रताप’ सरकार का ग़ुलाम नहीँ था।

‘प्रताप’ को रचनात्मक सहयोग देकर उसकी गति बढ़ाने का काम माखनलाल चतुर्वेदी, सोहनलाल द्विवेदी, सनेही, प्रतापनारायण मिश्र, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ इत्यादिक ने किये थे। जो ‘प्रताप’ आरम्भ मे साप्ताहिक समाचारपत्र के रूप मे प्रकाशित होता था, वह जनमानस के अपार नैतिक समर्थन पाकर २३ नवम्बर, १९२० ईसवी से दैनिक-समाचारपत्र के रूप मे प्रकाशित होने लगा। वे ‘प्रताप’ के माध्यम से अँगरेज़ी राज की दूषित नीतियोँ का लगातार विरोध करते रहे, जिसके कारण प्रताप की पहचान ‘सरकार-विरोधी समाचारपत्र’ के रूप मे हो चुकी थी। जिस साहस के साथ गणेशशंकर विद्यार्थी ‘प्रताप’ के माध्यम से स्वाधीनता-सेनानियोँ और क्रान्तिकारियोँ का साथ देते रहे, उससे ‘प्रताप’ भारतीय स्वाधीनता-संग्राम का मुखपत्र बन चुका था।

सच पूछिए तो ‘प्रताप’ का प्रकाशन दो तरह का काम करता था :– पहला, अँगरेजी राज के क्रूर कृत्योँ को सार्वजनिक करना और दूसरा, क्रान्तिकारियोँ को गोला, बम, बारूद इत्यादिक विस्फोटक सामान की व्यवस्था करना। ‘प्रताप’ समाचारपत्र का मुद्रण ‘प्रताप प्रेस’ से किया जाता था, जोकि गणेशशंकर विद्यार्थी की अपनी व्यवस्था थी।

उन दिनोँ हाथ से टाइप अक्षरोँ की व्यवस्था की जाती थी, जिसे ‘हैण्ड कम्पोजिंग’ कहा जाता है। चित्रादिक को समाचारपत्र मे मुद्रित करने के लिए मशीन से ‘ब्लॉक’ बनवाया जाता था; मगर ‘प्रताप प्रेस’ की माया अपरम्पार थी। उन दिनो अँगरेज़ी राज था, जिसमे भारतीय किसानो, वंचित और अभावग्रस्त लोग के साथ अँगरेज़ शासक मनमानी करते थे, जो गणेशशंकर विद्यार्थी के लिए सह्य नहीँ थी। ‘प्रताप प्रेस’ मे कम्पोजिंग बॉक्स के अक्षरोँ के ख़ाने के निचले हिस्से मे ‘बारूद’ रखने की व्यवस्था की गयी थी, जिसके ऊपर टाइपवाले अक्षर होते थे, ताकि किसी को संदेह न हो सके। इतना ही नहीँ, जहाँ ब्लॉक बनाया जाता था वहाँ ‘बम-निर्माण’ करने का सारा सामान उपलब्ध रहता था। उस व्यवस्था के कारण गोरोँ का पुलिस-प्रशासन ख़ाली हाथ लौट आया करता था।

उल्लेखनीय है कि ‘प्रताप’ समाचारपत्र की विषय-वस्तु अँगरेज़ी राज को ललकारते हुए सिद्ध होती थी, जिसके कारण विद्यार्थी को वर्ष १९२१ से १९३१ तक की अवधि मे पाँच बार कारावास का दण्ड भुगतना पड़ा था।

गणेशशंकर विद्यार्थी ने ‘प्रताप प्रेस’ की व्यवस्था इसलिए की थी कि उनकी क्रान्तिकारी गतिविधियोँ की गोपनीयता बनी रहे। उस प्रेस-भवन का निर्माण इस तरह से कराया गया था कि उसमे छिपकर बहुत दिनो तक रहा जा सकता था। इतना ही नहीँ, उसकी बनावट ऐसी थी कि अँगरेज़ी पुलिस-प्रशासन की ओर से अचानक छापा मारने के प्रभाव से बचने के लिए एक घर से दूजे के घर की छत पर आसानी से पहुँचकर अँगरेज़ोँ की आँखोँ मे धूलि झोँकी जा सकती थी। प्रताप प्रेस क्रान्तिकारियोँ का शरणस्थल था। बहुत कम लोग को मालूम होगा कि शहीदे आज़म सरदार भगत सिँह ‘प्रताप’ समाचारपत्र के लिए ‘बलवन्त सिँह’ के नाम से लगभग ढाई वर्ष तक लेखन-कार्य किये थे। वे दरियागंज, दिल्ली मे हुए दंगे की जानकारी एकत्र करने के लिए गुप्त रूप मे दिल्ली गये थे और वांछित सामग्री लेकर लौटे, फिर उसके आधार पर दो कॉलम की जो रिपोर्टिंग तैयार की थी, उसके ‘प्रताप’ के माध्यम से सार्वजनिक होते ही अँगरेज़ी प्रशासन की चूलेँ हिल गयीँ। गणेशशंकर विद्यार्थी ने भगत सिँह के अज्ञातवास की अवधि मे उनकी भेँट ‘प्रताप प्रेस’ मे ही चन्द्रशेखर आज़ाद से करायी थी। इसके साथ ‘प्रताप प्रेस’, कानपुर क्रान्तिकारियोँ की सैद्धान्तिक और व्यावहारिक गतिविधियोँ का प्रमुख गोपनीय केन्द्र बन गया था। प्रमुख क्रान्तिकारियोँ ने अपने संकट के दिनो मे वहीँ रहकर अपनी योजनाओँ की रूपरेखा तैयार की थी। ‘बनारस-षड्यन्त्र’ के आरोपित सुरेशचन्द्र भट्टाचार्य ‘प्रताप’ समाचारपत्र मे उपसम्पादक की भूमिका मे बने रहे। पं० रामदुलारे त्रिपाठी भी समाचारपत्र के साथ जुड़े रहे; परन्तु चर्चित ‘काकोरी-काण्ड’ मे भट्टाचार्य और त्रिपाठी को दण्ड मिला था। गणेशशंकर विद्यार्थी कारावास का जीवन व्यतीत कर रहे रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ से मिले और उनकी आत्मकथा गोपनीय ढंग से ले आये, जिसे उन्होँने ‘प्रताप’ मे एक धारावाहिक के रूप मे प्रकाशित किया था। गणेशशंकर विद्यार्थी का औदार्य और सौजन्य चर्चित रहा है। वे अपने क्रान्तिकारी मित्रोँ के परिवार से भी निकट से जुड़े हुए थे; जिनके दु:ख-सुख मे समभाव बने रहते थे। उन्होँने अशफ़ाकउल्लाह की क़ब्र का निर्माण कराया था। रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ की माँ की यथाशक्य सहायता की थी और शहीद रोशन सिँह-सहित कई क्रान्तिकारियोँ की पुत्रियोँ के कन्यादान किये थे। विद्यार्थी ने अँगरेज़ी शासन की ओर से क्रान्तिकारियोँ पर किये जानेवाले मुक़द्दमो से निबटने के लिए पं० हरकननाथ मिश्र को अधिवक्ता बनाया था। विद्यार्थी क्रान्तिकारियोँ के पक्ष मे पैरवी करने के लिए चर्चित अधिवक्ताओँ का एक दल बनाना चाहते थे; परन्तु उसके लिए आर्थिक व्यवस्था आड़े आ रही थी, फिर उन्होँने प्रताप प्रेस से अर्जित धनराशि से एक ‘डिफेंस फण्ड’ (सुरक्षा-निधि) बनाया। उसमे बड़ी संख्या मे धनराशि एकत्र की गयी थी। गणेशशंकर विद्यार्थी और पं० मोतीलाल नेहरू ने उस समय के सर्वाधिक चर्चित अधिवक्ता जगतनारायण मुल्ला से सम्पर्क किया; परन्तु वे न जाने किस कारण से अँगरेज़ोँ के पक्ष मे चले गये।

गणेशशंकर विद्यार्थी ने ‘प्रताप प्रेस’-कार्यालय मे एक भूमिगत कक्ष (तहख़ाना) का निर्माण कराया था, जिसमे अँगरेज़ी प्रशासन की ओर से ज़ब्त की गयीँ समस्त क्रान्तिकारी साहित्य एवं समाचारपत्र-पत्रिकाएँ छिपाकर रखी गयी थीँ। यही कारण था कि जब अँगरेज़-पुलिसकर्मी प्रेस मे छापा मारते थे तब उनके हाथ कुछ नहीँ लग पाता था। एक प्रकार से ‘प्रताप’ समाचारपत्र और ‘प्रताप प्रेस’ क्रान्तिकारियोँ के लिए सुरक्षा की ढाल बना रहा। उनके समाचारपत्र पर आर्थिक दण्ड लगाया जाता रहा; उनकी रिपोर्टिंग को रोकने के लिए बिजोलिया (राजस्थान) और ग्वालियर (मध्यप्रदेश) मे उनके और ‘प्रताप’ के विरुद्ध न्यायालय मे कई वाद (मुक़द्दमा) चलते रहे; परन्तु वे अपने पथ से विचलित नहीँ हुए। उन्होँने साहस और दृढ़तापूर्वक उनका सामना किया था। वे अपने समाचारपत्र के माध्यम से किसानो, कारख़ाना-श्रमिकोँ, वंचित-दलित-अभावग्रस्त लोग की कठिनाई और अभाव को सामने लाते रहे। जब सरदार भगत सिँह, जतिन्द्रनाथ दास तथा अन्य कारागार मे भूख-हड़ताल कर बैठे थे तब ‘प्रताप’ की रिपोर्टिंग ने पराधीन भारतीयोँ को उससे अवगत कराया और क्रान्तिकारियोँ के पक्ष मे जनमत तैयार किया था। गणेशशंकर विद्यार्थी का निर्णय और समझ के प्रति क्रान्तिकारियोँ का विश्वास इतना अधिक था कि वे अपनी कुछ महत्त्वपूर्ण योजनाओँ को क्रियान्वित करने से पहले विद्यार्थी की संस्तुति ले लेते थे। ‘प्रताप’ के साथ देश की जनता इस तरह से जुड़ चुकी थी, जिसका कोई जवाब नहीँ रहा। एक बार आर्थिक संकट का सामना करते हुए, ‘प्रताप’ बन्द होने की स्थिति को प्राप्त कर चुका था तब जनता ने चन्दा एकत्र कर, उसे आर्थिक सम्बल प्रदान किया था।

ज़मीँदारोँ ने जनवरी, १९२१ ई० मे रायबरेली मे वहाँ के किसानो पर गोलियाँ चलवा दी थीँ। इसकी सूचना पाते ही गणेशशंकर रायबरेली पहुँचकर आक्रान्त किसानो के साथ विमर्श किया और उन्हेँ एकजुट करते हुए, ‘प्रताप’ को उनकी आवाज़ बनायी थी। उन्होँने ‘रायबरेली-गोलीकाण्ड’ को ‘प्रताप’ मे लेख और सम्पादकीय लिखते हुए उसे ‘दूसरा जलियाँवाला-काण्ड’ बताया था। अँगरेज़-प्रशासन तो पहले से ही ख़ार खाया हुआ था; अनुकूल अवसर देखकर ‘प्रताप’ के सम्पादक गणेशशंकर विद्यार्थी और मुद्रक शिवनारायण मिश्र पर मानहानि का मुक़द्दमा कर दिया। सम्पादक और मुद्रक के पक्ष मे कुल ५० गवाह प्रस्तुत हुए थे, जिनमे पं० मोतीलाल नेहरू, पं० जवाहरलाल नेहरू और श्रीकृष्ण मेहता-जैसे राष्ट्रीय स्तर के राजनेता उपस्थित थे। उनके अधिवक्ताओँ मे जयकरणनाथ-सहित ८ अधिवक्ताओँ ने मुक़द्दमे की ज़ोरदार पैरवी की थी; लेकिन अन्यायपूर्ण अँगरेज़ी न्यायव्यवस्था के कारण गणेशशंकर विद्यार्थी को बचाया नहीँ जा सका; फलत: उन्हेँ कारावास का दण्ड भुगतना पड़ा। कारावास की अवधि-पूर्ण होने के बाद वे पुन: ससक्रिय राष्ट्रीय धारा मे लौटे। अँगरेज़-अधिकारियोँ को अपने गुप्तचरोँ से ज्ञात हुआ कि प्रताप प्रेस मे ५-५, ६-६ माह से भगत सिँह और चन्द्रशेखर आज़ाद अज्ञात रूप मे रह रहे थे तब उन्होँने अचानक छापा मारा और वहाँ के सारे फ़र्नीचर, मात्र एक कुर्सी को छोड़कर, उठवा लिये थे, फिर भी विद्यार्थी डिगे नहीँ। ‘प्रताप’ का ‘प्रताप’ था ही ऐसा!

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