डॉ० ए०पी०जे० अब्दुल कलाम : विज्ञान की उड़ान, साहित्य की चेतना और विकसित भारत का स्वप्न

अंतरिक्ष एवं रक्षा अनुसंधान में आत्मनिर्भरता के सूत्रधार, प्रेरक लेखक और युवाओं के मार्गदर्शक डॉ० कलाम के बहुआयामी व्यक्तित्व का विश्लेषण

भारत के आधुनिक इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे हैं, जिनका मूल्यांकन उनकी उपलब्धियों की सूची से नहीं, बल्कि समाज की चेतना पर उनके प्रभाव से किया जाता है। भारत रत्न डॉ. अवुल पकिर जैनुलाब्दीन अब्दुल कलाम ऐसे ही व्यक्तित्व थे। वे एक प्रख्यात एयरोस्पेस वैज्ञानिक, विज्ञान प्रशासक, शिक्षक, विचारक और लेखक थे। उन्होंने जहाँ भारत के अंतरिक्ष एवं रक्षा कार्यक्रमों को नई दिशा देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई, वहीं अपनी पुस्तकों और व्याख्यानों के माध्यम से करोड़ों युवाओं में आत्मविश्वास, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और राष्ट्रनिर्माण की आकांक्षा जगाई।

डॉ. कलाम को ‘मिसाइल मैन ऑफ इंडिया’ तथा ‘जनता के राष्ट्रपति’ के रूप में पहचान मिली। वर्ष 2002 से 2007 तक भारत के राष्ट्रपति के रूप में कार्य करते हुए भी उन्होंने विद्यार्थियों, शिक्षकों और युवा वैज्ञानिकों के साथ संवाद को अपनी प्राथमिकताओं में बनाए रखा। उनके व्यक्तित्व की विशिष्टता इस तथ्य में निहित थी कि वे विज्ञान को केवल प्रयोगशालाओं और तकनीकी संस्थानों तक सीमित नहीं मानते थे, बल्कि उसे सामाजिक परिवर्तन, मानवीय कल्याण और राष्ट्रीय विकास का प्रभावी माध्यम समझते थे।

उनके वैज्ञानिक और साहित्यिक योगदान का अध्ययन इस व्यापक दृष्टिकोण से किया जाना चाहिए कि किस प्रकार तकनीकी उपलब्धियाँ, शिक्षा, नैतिक मूल्यों और सामाजिक उत्तरदायित्व के साथ मिलकर किसी राष्ट्र की विकास-यात्रा को गति प्रदान कर सकती हैं।

डॉ० कलाम के वैज्ञानिक जीवन का एक महत्त्वपूर्ण अध्याय भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) से जुड़ा है। वे भारत के पहले सफल स्वदेशी उपग्रह प्रक्षेपण यान एसएलवी-III (SLV-III) के परियोजना निदेशक थे। 18 जुलाई 1980 को इस प्रक्षेपण यान के माध्यम से रोहिणी उपग्रह को पृथ्वी की निकट कक्षा में स्थापित किया गया। यह उपलब्धि भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के इतिहास में निर्णायक पड़ाव सिद्ध हुई और भारत ने स्वदेशी प्रक्षेपण क्षमता विकसित करने की दिशा में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की। इस उपलब्धि का महत्त्व केवल एक उपग्रह के सफल प्रक्षेपण तक सीमित नहीं था। इसने भारतीय वैज्ञानिकों और अभियंताओं की तकनीकी क्षमता, संस्थागत समन्वय तथा जटिल परियोजनाओं को स्वदेशी संसाधनों के आधार पर पूरा करने की संभावना को प्रमाणित किया। डॉ. कलाम का योगदान इसी व्यापक प्रक्रिया का हिस्सा था, जिसमें विभिन्न वैज्ञानिक दलों के सामूहिक प्रयासों को एक साझा लक्ष्य से जोड़ा गया।

इसरो में अर्जित अनुभव ने आगे चलकर उनके रक्षा अनुसंधान संबंधी कार्यों को भी दिशा दी। प्रक्षेपण यान तकनीक, प्रणोदन, नियंत्रण प्रणाली और परियोजना प्रबंधन के क्षेत्र में विकसित क्षमताएँ भारत की दीर्घकालीन तकनीकी आत्मनिर्भरता के लिए महत्त्वपूर्ण थीं।

वर्ष 1982 में डॉ० कलाम रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) से जुड़े और भारत के निर्देशित मिसाइल विकास कार्यक्रम को आकार देने में केंद्रीय भूमिका निभाई। यहीं 1983 मे शुरू हुआ और उनके नेतृत्व मे एकीकृत निर्देशित मिसाइल विकास कार्यक्रम (IGMDP) शुरू हुआ। इसका उद्देश्य देश की सामरिक आवश्यकताओं के अनुरूप स्वदेशी मिसाइल प्रौद्योगिकी विकसित करना था।

इस कार्यक्रम के अंतर्गत पाँच प्रमुख मिसाइल प्रणालियों के विकास को विशेष महत्त्व मिला। पहली अग्नि बैलिस्टिक मिसाइलों की शृंखला है। जिसने भारत की सामरिक क्षमता के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी। दूसरी पृथ्वी है जो सतह से सतह पर मार करने वाली बैलिस्टिक मिसाइल प्रणाली। तीसरी है आकाश जो सतह से हवा में लक्ष्य भेदने वाली वायु रक्षा मिसाइल प्रणाली। चौथी मिसाइल त्रिशूल है। यह कम दूरी की सतह से हवा में मार करने के उद्देश्य से विकसित की गयी मिसाइल प्रणाली है। पाँचवीं मिसाइल नाग को टैंकों एवं अन्य बख्तरबंद लक्ष्यों के विरुद्ध विकसित टैंक-रोधी निर्देशित मिसाइल प्रणाली के रूप मे विकसित किया गया।

इन परियोजनाओं की उपलब्धियों को केवल हथियारों के विकास के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। इनके माध्यम से भारत ने प्रणोदन, मार्गदर्शन, नियंत्रण, इलेक्ट्रॉनिक्स और संबंधित तकनीकी क्षेत्रों में स्वदेशी विशेषज्ञता विकसित करने का प्रयास किया। विभिन्न अनुसंधान प्रयोगशालाओं, औद्योगिक इकाइयों और वैज्ञानिक संस्थानों के बीच सहयोग को प्रोत्साहित करना भी इस कार्यक्रम का महत्त्वपूर्ण पक्ष था। इसीलिए डॉ० कलाम की भूमिका एक वैज्ञानिक या परियोजना प्रमुख तक सीमित नहीं थी। वे जटिल वैज्ञानिक परियोजनाओं में सामूहिक नेतृत्व, संस्थागत समन्वय और दीर्घकालीन तकनीकी क्षमता निर्माण के महत्त्व को रेखांकित करने वाले विज्ञान प्रशासक भी थे।

वर्ष 1998 में भारत द्वारा किए गए पोखरण-द्वितीय परमाणु परीक्षणों में डॉ. कलाम ने महत्त्वपूर्ण वैज्ञानिक एवं समन्वयकारी भूमिका निभाई। उस समय वे रक्षा अनुसंधान एवं विकास विभाग के सचिव तथा रक्षा मंत्री के वैज्ञानिक सलाहकार थे। इन परीक्षणों में परमाणु ऊर्जा विभाग और रक्षा वैज्ञानिक समुदाय के बीच समन्वय भी महत्त्वपूर्ण था।

पोखरण-द्वितीय ने भारत की सामरिक नीति और अंतरराष्ट्रीय स्थिति को प्रभावित किया। इस घटनाक्रम का मूल्यांकन करते समय इसके वैज्ञानिक, सुरक्षा संबंधी और कूटनीतिक आयामों को साथ रखकर देखना आवश्यक है। डॉ० कलाम का योगदान विशेष रूप से वैज्ञानिक क्षमताओं के समन्वय और राष्ट्रीय तकनीकी सामर्थ्य के विकास के संदर्भ में उल्लेखनीय है।

डॉ० कलाम की वैज्ञानिक दृष्टि का एक उल्लेखनीय पक्ष यह था कि वे प्रौद्योगिकी के लाभों को समाज के व्यापक वर्गों तक पहुँचाने के पक्षधर थे। उनके विचार में विज्ञान की सार्थकता तभी पूर्ण होती है, जब वह जीवन की वास्तविक समस्याओं के समाधान में योगदान दे।

हृदय रोगियों के लिए कम लागत वाला ‘कलाम-राजू स्टेंट’ इसी सोच का उदाहरण है। वर्ष 1998 में उन्होंने हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. बी. सोमा राजू के साथ मिलकर इस स्टेंट के विकास में योगदान दिया। इसका उद्देश्य ऐसी चिकित्सा तकनीक को अपेक्षाकृत किफायती बनाना था, जिसकी आवश्यकता आर्थिक रूप से कमजोर रोगियों को भी पड़ सकती है।

बाद में डॉ० कलाम और डॉ० सोमा राजू ने ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं तथा प्राथमिक चिकित्सा सुविधाओं को ध्यान में रखते हुए ‘कलाम-राजू टैबलेट’ विकसित करने की पहल की। यह उदाहरण दर्शाता है कि डॉ० कलाम की तकनीकी रुचि रक्षा और अंतरिक्ष तक सीमित नहीं थी; वे स्वास्थ्य सेवा तथा ग्रामीण क्षेत्रों में तकनीक के उपयोग को भी महत्त्व देते थे।

इसी क्रम में स्वदेशी हल्के लड़ाकू विमान (LCA) के विकास को प्रोत्साहित करने और उससे संबंधित तकनीकी कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने में उनकी भूमिका उल्लेखनीय रही। इन प्रयासों के पीछे व्यापक उद्देश्य देश की महत्त्वपूर्ण तकनीकी आवश्यकताओं के लिए विदेशी निर्भरता कम करना और घरेलू अनुसंधान क्षमता को मजबूत करना था।

डॉ० कलाम के विचारों में विज्ञान, अर्थव्यवस्था और सामाजिक विकास के बीच गहरा संबंध दिखाई देता है। प्रौद्योगिकी सूचना, पूर्वानुमान एवं मूल्यांकन परिषद (TIFAC) से जुड़े कार्यों के दौरान उन्होंने विशेषज्ञों के सहयोग से भारत के विकास की दीर्घकालीन रूपरेखा तैयार करने में नेतृत्व किया। इस विचार-यात्रा का प्रमुख परिणाम ‘टेक्नोलॉजी विजन 2020’ के रूप में सामने आया।

डॉ० कलाम और वाई० एस० राजन की पुस्तक (इण्डिया 2020: अ विज़न फ़ॉर द न्यू मिलेनियम) India 2020: A Vision for the New Millennium में भारत को विकसित राष्ट्र बनाने की परिकल्पना प्रस्तुत की गयी। इसमें कृषि, खाद्य प्रसंस्करण, शिक्षा, स्वास्थ्य, सूचना प्रौद्योगिकी, ऊर्जा, आधारभूत संरचना और वैज्ञानिक अनुसंधान जैसे क्षेत्रों को परस्पर संबद्ध विकास के घटकों के रूप में देखा गया।

इस दृष्टि का केंद्रीय संदेश था कि राष्ट्रीय विकास केवल आर्थिक आँकड़ों की वृद्धि नहीं है। इसके लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, वैज्ञानिक सोच, रोजगार के अवसर, तकनीकी नवाचार और नागरिकों के जीवन स्तर में सुधार आवश्यक हैं। वर्ष 2020 तक विकसित भारत का लक्ष्य निर्धारित समय-सीमा में पूर्णतः प्राप्त नहीं हुआ, लेकिन इस परिकल्पना का महत्त्व समाप्त नहीं हो जाता। इसकी प्रासंगिकता इस बात में है कि यह देश के सामने विकास के लिए एक व्यापक दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है और विज्ञान को राष्ट्रीय प्राथमिकताओं से जोड़ने की प्रेरणा देती है।

डॉ० कलाम के व्यक्तित्व का दूसरा महत्त्वपूर्ण पक्ष उनका साहित्यिक योगदान है। उनकी पुस्तकों में आत्मकथात्मक अनुभव, वैज्ञानिक उपलब्धियों का विवरण, राष्ट्रीय विकास की परिकल्पना, युवाओं के लिए प्रेरक संदेश और जीवन के नैतिक प्रश्न एक साथ उपस्थित होते हैं। उनकी लेखन-शैली सामान्यतः सरल, संवादपरक और प्रेरणात्मक है। वे वैज्ञानिक उपलब्धियों को केवल तकनीकी विवरण के रूप में प्रस्तुत नहीं करते, बल्कि उनके पीछे काम करने वाले परिश्रम, अनुशासन, असफलताओं, सहयोग और आत्मविश्वास की भूमिका को भी रेखांकित करते हैं।

डॉ. कलाम की आत्मकथा विंग्स ऑफ फ़ायर _(Wings of Fire)_ भारतीय युवाओं के बीच व्यापक रूप से लोकप्रिय हुई। अरुण तिवारी के सहयोग से लिखी गई इस पुस्तक में उनके बचपन, शिक्षा, प्रारंभिक संघर्ष, वैज्ञानिक जीवन और अंतरिक्ष तथा रक्षा कार्यक्रमों से जुड़े अनुभवों का वर्णन मिलता है। रामेश्वरम के साधारण पारिवारिक परिवेश से निकलकर देश के प्रमुख वैज्ञानिकों में स्थान बनाने तक की उनकी यात्रा इस पुस्तक का केंद्रीय आकर्षण है। इसमें सफलता को किसी आकस्मिक चमत्कार के रूप में नहीं, बल्कि निरंतर सीखने, परिश्रम, अनुशासन और सामूहिक प्रयासों के परिणाम के रूप में समझा जा सकता है। इस पुस्तक की विशेषता यह है कि यह आत्मकथा होने के साथ-साथ वैज्ञानिक संस्थानों में कार्य-संस्कृति और नेतृत्व के महत्त्व को समझने का अवसर भी प्रदान करती है।

वर्ष 2002 में प्रकाशित इग्नाइटेड माइंड्स: अनलीशिंग द पॉवर विदइन इण्डिया _(Ignited Minds: Unleashing the Power Within India)_ डॉ. कलाम की युवा-केंद्रित विचारधारा का महत्त्वपूर्ण दस्तावेज है। इसमें उन्होंने देश की वास्तविक शक्ति को उसके नागरिकों, विशेषकर बच्चों और युवाओं की सृजनात्मक क्षमता में देखा। उनके अनुसार, विकसित राष्ट्र बनने के लिए केवल संसाधन पर्याप्त नहीं हैं; आवश्यक है कि नागरिकों में प्रश्न पूछने, नए विचार विकसित करने, समस्याओं का समाधान खोजने और सामूहिक उत्तरदायित्व निभाने की प्रवृत्ति हो।

यह दृष्टिकोण शिक्षा को परीक्षा और प्रमाणपत्र तक सीमित रखने के बजाय जिज्ञासा, रचनात्मकता और चरित्र निर्माण से जोड़ता है। इस अर्थ में इग्नाइटेड माइंड्स को केवल प्रेरक साहित्य नहीं, बल्कि शिक्षा और राष्ट्रीय विकास पर केंद्रित एक विचारपरक कृति के रूप में भी पढ़ा जा सकता है। इण्डिया 2020 डॉ० कलाम के साहित्यिक एवं बौद्धिक योगदान का ऐसा उदाहरण है, जिसमें तकनीकी विश्लेषण और राष्ट्रीय विकास की कल्पना एक-दूसरे से जुड़ते हैं। वाई० एस० राजन के साथ लिखी गई इस पुस्तक में भारत की विकास संबंधी चुनौतियों और संभावनाओं का विवेचन किया गया है। इसकी विशेषता यह है कि इसमें भविष्य की कल्पना को ठोस क्षेत्रों और विकास संबंधी प्राथमिकताओं से जोड़ने का प्रयास मिलता है। कृषि उत्पादन, औद्योगिक विकास, वैज्ञानिक अनुसंधान, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे विषयों के माध्यम से यह पुस्तक राष्ट्रीय विकास को बहुआयामी प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत करती है।

डॉ० कलाम की अन्य उल्लेखनीय पुस्तकों में माई जर्नी (_My Journey_), इण्डॉमिटेबल स्पिरिट (_Indomitable Spirit_), गाइडिंग सोल्स (_Guiding Souls_), मिशन इण्डिया (_Mission India_) और द ल्यूमिनस स्पार्क्स (_The Luminous Sparks_) शामिल हैं। उनकी रचनाओं का दायरा आत्मकथा और प्रेरक गद्य से आगे बढ़कर कविता, जीवन-दर्शन और सामाजिक परिवर्तन तक विस्तृत है।

उनके साहित्य का अध्ययन करते समय यह भी ध्यान रखना चाहिए कि उनकी कुछ पुस्तकों में सहलेखकों का योगदान रहा है। इसलिए प्रत्येक कृति को उसके वास्तविक लेखकीय संदर्भ में समझना उचित होगा।

डॉ० कलाम जटिल वैज्ञानिक एवं तकनीकी विचारों को सामान्य पाठक के लिए सहज बनाने का प्रयास करते थे। उनकी भाषा में व्याख्यान की स्पष्टता और संवाद की आत्मीयता दिखाई देती है। उनकी रचनाओं में युवा केवल भविष्य के नागरिक नहीं, बल्कि वर्तमान के सक्रिय परिवर्तनकारी सहभागी हैं। वे युवाओं को बड़े लक्ष्य निर्धारित करने, ज्ञान अर्जित करने और अपने विचारों को कर्म में बदलने के लिए प्रेरित करते हैं। डॉ० कलाम वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ मानवीय मूल्यों और आध्यात्मिक चिंतन को भी महत्त्व देते थे। उनकी सोच में आस्था और वैज्ञानिक जिज्ञासा को संवाद के दायरे में रखने की प्रवृत्ति दिखाई देती है। उनके लिए नैतिकता, अनुशासन और मानवीय संवेदना वैज्ञानिक प्रगति के विरोधी नहीं, बल्कि उसके उत्तरदायी उपयोग के लिए आवश्यक आधार थे। उनके साहित्य में राष्ट्र के प्रति प्रतिबद्धता का स्वर प्रमुख है। यह राष्ट्रबोध केवल गौरवगान तक सीमित नहीं, बल्कि शिक्षा, अनुसंधान, सामाजिक समानता और तकनीकी आत्मनिर्भरता के माध्यम से देश को बेहतर बनाने की आकांक्षा से जुड़ा है। उनकी रचनाएँ पाठक को केवल प्रेरित करने का प्रयास नहीं करतीं, बल्कि लक्ष्य निर्धारण, निरंतर परिश्रम और असफलताओं से सीखने की आवश्यकता पर भी बल देती हैं। यही गुण उनके साहित्य को विद्यार्थियों, शिक्षकों और युवा पेशेवरों के लिए उपयोगी बनाते हैं।

डॉ० कलाम के व्यक्तित्व को समझने के लिए उनके वैज्ञानिक और साहित्यिक योगदान को अलग-अलग खाँचों में बाँटना पर्याप्त नहीं है। विज्ञान में उनका अनुभव उनके लेखन को व्यावहारिक आधार प्रदान करता है, जबकि साहित्य और संवाद के माध्यम से वे विज्ञान के सामाजिक अर्थ को स्पष्ट करते हैं। मिसाइल विकास कार्यक्रमों में उनकी भूमिका तकनीकी दक्षता, संस्थागत समन्वय और लक्ष्य के प्रति प्रतिबद्धता का उदाहरण है। दूसरी ओर, उनकी पुस्तकों में इन्हीं गुणों का विस्तार व्यक्तिगत जीवन, शिक्षा और राष्ट्रीय विकास के संदर्भ में दिखाई देता है।

यहाँ एक महत्त्वपूर्ण अंतर भी समझना आवश्यक है। वैज्ञानिक उपलब्धियों का मूल्यांकन तकनीकी परिणामों, परीक्षणों और संस्थागत प्रमाणों से किया जाता है, जबकि साहित्यिक योगदान का आकलन विचारों की गुणवत्ता, भाषा, पाठकीय प्रभाव और सामाजिक प्रासंगिकता के आधार पर होता है। डॉ. कलाम के व्यक्तित्व में इन दोनों क्षेत्रों का मेल उन्हें विशिष्ट बनाता है। उनकी दृष्टि में वैज्ञानिक ज्ञान का उद्देश्य केवल तकनीकी श्रेष्ठता हासिल करना नहीं, बल्कि मानव जीवन को बेहतर बनाना भी था। कम लागत वाली चिकित्सा तकनीक, ग्रामीण स्वास्थ्य के लिए डिजिटल उपकरण और विकसित भारत की परिकल्पना इसी व्यापक सोच के उदाहरण हैं।

इस दृष्टि से उनका जीवन विज्ञान और मानविकी के बीच संवाद की संभावनाओं को रेखांकित करता है। तकनीकी विकास तभी व्यापक सामाजिक अर्थ ग्रहण करता है, जब उसके साथ नैतिक विवेक, शिक्षा, मानवीय संवेदना और सार्वजनिक उत्तरदायित्व भी जुड़े हों।

डॉ० ए०पी०जे० अब्दुल कलाम का जीवन इस तथ्य का प्रमाण है कि व्यक्तिगत संघर्ष, ज्ञान के प्रति समर्पण और सामाजिक उत्तरदायित्व एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं। उन्होंने भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम और स्वदेशी मिसाइल विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई, नागरिक उपयोग की तकनीकों को प्रोत्साहित किया तथा अपने लेखन के माध्यम से विज्ञान और राष्ट्रीय विकास के प्रश्नों को आम पाठक तक पहुँचाया। उनकी सबसे बड़ी विरासत केवल विकसित की गई तकनीकों या लिखी गई पुस्तकों में नहीं, बल्कि उस विचारधारा में निहित है, जो युवाओं को ज्ञान अर्जित करने, स्वतंत्र चिंतन करने और समाज के प्रति उत्तरदायी बनने की प्रेरणा देती है।

रामेश्वरम में जन्मे एक साधारण परिवार के बालक से लेकर भारत के सर्वोच्च संवैधानिक पद तक पहुँचे डॉ. कलाम की यात्रा सामाजिक गतिशीलता, शिक्षा और व्यक्तिगत परिश्रम की संभावनाओं को उजागर करती है। उनका जीवन यह भी सिखाता है कि बड़ी उपलब्धियाँ व्यक्तिगत प्रतिभा के साथ-साथ सहयोग, संस्थागत क्षमता और निरंतर सीखने की प्रक्रिया से निर्मित होती हैं।

27 जुलाई 2015 को भारतीय प्रबंधन संस्थान, शिलांग में विद्यार्थियों को संबोधित करते समय अचानक हुए हृदयाघात से उनका निधन हुआ। जीवन के अंतिम क्षणों तक शिक्षा और युवा संवाद से जुड़े रहना उनके व्यक्तित्व का उल्लेखनीय पक्ष था।

आज जब भारत वैज्ञानिक अनुसंधान, तकनीकी नवाचार, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और समावेशी विकास की चुनौतियों से जूझ रहा है, तब डॉ० कलाम के विचारों को केवल प्रेरक नारों के रूप में दोहराना पर्याप्त नहीं है। उनकी वास्तविक स्मृति तभी सार्थक होगी, जब वैज्ञानिक जिज्ञासा को प्रोत्साहन मिले, शिक्षा में रचनात्मकता को स्थान मिले और तकनीकी प्रगति का लाभ समाज के व्यापक वर्गों तक पहुँचे।

एक विज्ञानी के रूप में उन्होंने भारत की तकनीकी क्षमताओं को मजबूत करने में योगदान दिया और एक लेखक एवं शिक्षक के रूप में ज्ञान को जनचेतना से जोड़ने का प्रयास किया। कलाम साहब का मानना था कि —*विज्ञान से सामर्थ्य, साहित्य से संवेदना और शिक्षा से राष्ट्रनिर्माण* का मार्ग प्रशस्त होता है और यही उनके बहुआयामी व्यक्तित्व की केंद्रीय विशेषता थी।