● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
काँवरियों (‘काँवड़ियों’ अनुपयुक्त शब्द है।) को इतनी सुविधाएँ न दी जायें कि जनसामान्य का गमनागमन (‘आवागमन’ अशुद्ध शब्द है।) अवरुद्ध हो जाये। सभी समुदाय के पूजा-पाठ को समान रूप से देखने का स्वभाव भा०ज०पा० के सरकार-संचालकों को बनाना होगा।
क्या काँवरियों की अनिश्चित समयावधि मे आने-जाने से प्रतिदिन अपने कार्यालयों आदिक जाने और आनेवालों को असुविधा नहींं हो रही है? उनके कारण बाधित मार्गों से कार्यालयों, शिक्षणसंस्थानो आदिक मे विलम्ब से पहुँचने पर उपस्थिति-पंजिका मे कर्मचारियों के नाम के सामने ‘अनुपस्थिति’ अथवा ‘लाल निशान’ लगने के लिए कथित सरकारों की एकपक्षीय नीतियाँ उत्तरदायी नहीं हैं? ये सरकारें कब तक तुष्टीकरण (‘तुष्टिकरण’ अशुद्ध है।) की गर्हित राजनीति करती रहेंगी?
महँगाई चरम पर है और कथित काँवरियों पर हेलीकॉप्टर से फूल बरसाये जा रहे हैं? एक मत-विशेष के लोग की कर्मकाण्डीय यात्रा पर कथित सरकारों की विशेष मेहरबानी इसीलिए है कि ‘हिन्दू’ भीड़ पर ‘भेड़’ का चरित्र प्रत्यारोपित कर अपने-अपने उल्लू सीधे किये जाते रहें; लगभग ९ वर्षों से देश के अधिकतर राज्यों मे यही देखा जा रहा है।
‘न्यू इण्डिया की मोदी-सरकार’ के पहरुए इन सब विषयों पर प्रतिक्रियाविहीन रहे हैं। एक माह के भीतर लगभग सभी वस्तुओं के मूल्यों मे स्वत: वृद्धि होती जा रही है और कथित मोदी-योगी-सरकारों के प्रमुख हिन्दू-हिन्दुत्व’ की अफ़ीम की फैक्टरी खोले जा रहे हैं।
विद्यार्थियों से नौकरियों के लिए डी० डी० आदिक के माध्यम से प्रवेश और परीक्षाशुल्क ले लिये जा रहे हैं; संस्थानो, आयोगों आदिक की बेहद घटिया नीति के कारण न तो प्रवेश कराये जाते हैं और न ही परीक्षाएँ करायी जाती हैं। इस प्रकार सरकारें जमा की गयी धनराशि के ब्याज का दुरुपयोग करती आ रही हैं; वर्षों हो जाते हैं, परीक्षाओं की तारीख़ तक निर्धारित नहीं की जाती। यदि परीक्षाओं की तिथि निर्धारित की जाती है तो ‘पेपर लीक’ कराकर परीक्षाओं को अनिश्चित काल के लिए टाल दिया जाता है। यदि परीक्षाएँ करा भी ली जाती हैं तो प्रश्नपत्र तैयार करनेवाले जाहिल प्राश्निकों के ग़लत और अशुद्ध प्रश्नों के कारण अभ्यर्थियों को न्यायालय के चक्कर काटने पड़ते हैं, जिनमे कथित हिन्दू अभ्यर्थियों की बहुत बड़ी संख्या होती है। विषय यहीं तक सीमित नहीं हैं; यदि परीक्षाएँ विधिवत् करा भी ली जाती हैं तो उनके परिणाम प्रकाशित करने मे वर्षों के समय लग जाते हैं। आज भी अनेक परीक्षाओं के परिणाम लम्बित हैं और अभ्यर्थी प्रतीक्षा सहते-सहते, दो-चार बच्चों के बेरोज़गार बाप बनते जा रहे हैं और नौकरी के लिए निर्धारित अवस्था से बाहर भी होते जा रहे हैं। वे अभ्यर्थी वर्षों तक न्याय की लड़ाई लड़ते-लड़ते बूढ़े हो जाते हैं; परन्तु अफ़्सोस! (‘अफ़सोस’ अशुद्ध है।) उनमे से अधिकतर भगवाधारियों के पिछलग्गू बनने से बाज़ नहीं आ रहे हैं। यही कथित अभ्यर्थी आज भी एक ‘अफ़ीमची’ से अधिक का चरित्र जी नहीं पाते और जिस ‘जय सिरी राम’ का नारा आक्रामक तौर पर लगाते अघाते नहीं, उनका वही ‘राम’ हितैषी बनकर सामने नहींं आ पाता और ऐसे ही लोग कर्मकाण्डीय बोझ लिये हुए दुनिया से कूच कर जाते हैं तथाकथित हिन्दूवादी सरकारों के प्रतिनिधि उनकी खोज-ख़बर तक नहीं लेते।
घोर आश्चर्य! इतना सब घटते रहने के बाद भी कथित हिन्दुओं की आँखें नहीं खुलतीं। वह भी अच्छा रहता कि बेरोज़गार होते अधिकतर ग़ैर-ज़िम्मादार (‘ज़िम्मेदार’ अशुद्ध है।) विद्यार्थियों को ‘जय सिरी राम’ बोलने अथवा हिन्दुत्व का परचम लहराने अथवा किसी पार्क मे बैठकर विचार-विमर्श करती युवक-युवतियों को धमकाकर, मार-पीटकर भगाने, लव-ज़िहाद के विरुद्ध मोर्चा खोलने आदिक के लिए १०-२० हज़ार रुपये महीने दिये जाते।
मत भूलो! यह वो हिन्दूवादी सरकारों के नुमाइन्दे हैं, जो तुम बेरोज़गारों की जेब से रुपये निकलवा ले।
अब भी वक़्त है, शालीनतापूर्वक अध्ययन करो; अध्यवसाय करो और अपने उद्देश्य की प्राप्ति कर अपने परिवार को उन्नत करो, अन्यथा तुम सभी से जब तुम्हारी संतति एक स्वर मे पूछेगी– आपने हमारे भविष्य के लिए क्या किया है तब तुम सभी कथित हिन्दू बेरोज़गार उत्तर दे नहीं पाओगे और अपने बच्चों के सम्मुख हर पल स्वयं को अपराधी के रूप मे पाओगे। अब यह तुम सभी को तय करना है– कथित हिन्दूधर्म के हरकारा बनोगे अथवा एक स्वस्थ छविवाला जीवन-यापन करना पसन्द करोगे?
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १५ जुलाई, २०२२ ईसवी।)