ग़ज़नी-गोरी मिल गये, लूट रहे अब देश

● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

एक–
ध्यान बँटाने के लिए, तरह-तरह की खोज।
मन्दिर-मस्जिद लड़ रहे, हर पल हर दिन रोज़।।
दो–
सत्ता चेरी बन गयी, कुरसी चिपकी देह।
रड़ुवा-रड़ुवी संग हैं, माग भरी है रेह।।
तीन–
ग़ज़नी-गोरी मिल गये, लूट रहे अब देश।
चण्डाली सूरत दिखे, करें धूर्त्त उपदेश।।
चार–
कुत्ते जंगल छोड़कर, पायें शहरी ठाँव।
बेसुध इतने दिख रहे, भूल गये हैं गाँव।।
पाँच–
रबड़ी चाँपें चाँपकर, जनता भूखी सोय।
रामराज पहचान है, काहें को अब रोय।।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १८ अप्रैल, २०२२ ईसवी।)