डाकेटर पिरीथिबीनाथ पाँड़े (डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय)-
‘छठि’ के नउवा सुनि के आपन गाँव, घर, दुआरि आ पोखरा याद आवे लागल। मुँड़ी पर फल-फूल, सिंघाड़ा, ठेकुआ, पूआ-पूड़ी, भीगल चाना, उखि के गेंड़, पटउरा, बताशा, लचिदाना, हलुआ से भरल सूप आ बड़की डलिया रखल सब याद आवे लागल। लोरि रुके के नाव नइखे लेत। गँउआ के आपन बचपन अँखिया में जीये लागल। उहो एगो समय रहे। अब सब हेनर-बेनर होई गईल।
ना अब गाँव बा, ना घर बा आ ना दुआरि रहल; ना डेरा बा, ना खेत बा, ना खरिहान बा, ना गाइ बा, ना बैल बा, आ नाहीं बाग-बगइचा बा। सब बिलाइ गइल। सब बेकति मरि गइल, हेराइ गइल, बिछुड़ि गइल। अब त केहू के खोजहूँ के मन ना करेला। जब दियानत में कवनो खोटि आ जाला नू त मनवा सब केहू से फाटि जाला। ना उधो के लीहल आ ना माधो के दीहल। ना मूअला में आ न जियला में। एही से नू कहल जाला, एइजा सब केहू स्वारथ के पुतला बा।
आ ईहो साँचि बा ओने की ओर से आपन जिनगी बैरंग चिट्ठी-पतर लेखा होई गइल बा।
इ त एगो हावा के झँकोर हवे आ भाव के हिलोर हवे। मनवा ना मानल ह त लिखि देहनी हाँ; बाकिर इहो बतिया सही बा कि इ पानी के बुदबुदवा हवे, जलदिये फूटि जाई।
जइसे घाव पाकि जाला त फोड़ा बनि जाला आ अचके फूटि जाला; ओही तरी, हमार छठि आ घरि-दुआर के मोह फूटि-फाटि के अकोरि होइ जाई।
कुछू बुझाइल कि ना जी?