भारतीय नरेशों की हिंदी-सेवा : भारतीय इतिहास की एक अमूल्य सारस्वत निधि

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

यह कृति निजी डाकसेवान्तर्गत आज (२९ सितम्बर) ही हस्तगत हुई है। प्रथम दृष्ट्या श्रद्धेय डॉ० किरन पाल सिंह जी (कार्यक्रम निदेशक– भारतीय राजभाषा विकास संस्थान, देहरादून (उत्तराखण्ड) के कुशल सम्पादकत्व में सार्वजनिक हुई इस कृति को विविध विषयक ६४ प्रबुद्ध लेखकवृन्द ने अपनी गवेषणात्मक शैली का परिचय देते हुए समृद्ध किया है।
निस्सन्देह, यह कृति भारतीय साहित्य की एक अक्षुण्ण निधि है। हमारी शोधच्छात्र-छात्राओं के ज्ञानवर्द्धन करने, हिन्दी-क्षेत्र में भारतीय नरेशों के श्लाघ्य और स्तुत्य योगदान का बोध कराने के लिए ‘भारतीय नरेशों की हिन्दी-सेवा’ विषयक यह ऐतिहासिक कृत्य ‘मील का पत्थर’ सिद्ध होगी, विश्वास है।
श्रद्धेय अग्रज और सारस्वत मित्र ‘पद्मश्री’ डॉ० श्याम सिंह ‘शशि’ जी ने ‘आमुख’ के अन्तर्गत अपना महत् योगदान कर उक्त कृति की उपयोगिता-महत्ता सम्यकरूपेण रेखांकित की है। इस-हेतु समादरणीय शशि जी के सौजन्य के प्रति हम नमित हैं।

इस अध्यवसाय-साध्य, समय-साध्य, प्रबन्धन-साध्य तथा कष्ट-साध्य कृति को मुद्रित और प्रकाशित कराने के लिए ‘भारतीय राजभाषा विकास संस्थान’, देहरादून के सम्बद्ध समस्त पदाधिकारीगण साधुवाद के पात्र हैं।

भारतीय अधिपतियों के उत्कट हिन्दी-अनुराग को अपने बुद्धि-कौशल से परिव्याप्त करने में बहुविध समर्थ निष्णात सम्पादक और अनेक कृतियों के प्रणेता सम्मान्य डॉ० किरन पाल सिंह जी के प्रति हम हिन्दी के अनन्य सेवकवृन्द कृतज्ञ हैं।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २९ सितम्बर, २०२० ईसवी।)