आइए! सत्य-संधान करें

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

— आचार्य पंडित पृथ्वीनाथ पाण्डेय

प्राय: सत्य स्वयं में नितान्त कटु होता है। इसका आयाम बृहद् है— कहीं मृदु अनुभव होता है और कहीं कठोर। यहीं पर सत्य की प्रियता-अप्रियता की, यापित काल-खण्डों में गहन अनुभूति होती है। सत्य की डोर ‘तन्तु-सदृश्’ है, जो मन-मस्तिष्क के साथ प्रतिपल सम्पर्कित है। सत्य मनुष्य के अन्तस् में समासीन रहकर मन-सौन्दर्य को विकसित करते हुए, उसका विस्तार करता है। अस्तित्व-संघर्ष और अस्मिता-लोप का भय मनुष्य को ‘सत्य’ से परे धकेलता है; क्योंकि उसके साहस और उसकी सहिष्णुता में शुचिता नहीं रह पाती।

सत् शाश्वत् है और असत् क्षणभंगुर। मनुष्य ने ज्योंही मनसा-वाचा-कर्मणा प्रायश्चित्त (‘प्रायश्चित’ अशुद्ध है।) कर लिया, असत्य उससे सुदूर हो गया। मनुष्य की प्रथम और अन्तिम आस्था एकमेव ‘सत्य’ के प्रति रहनी चाहिए; क्योंकि दृष्टि में वस्तुपरकता लाते ही भौतिकता और आत्मिकता के मार्ग उसी से निर्गत होकर समानान्तर दृष्टिगोचर होते हैं। जिस क्षण से मनुष्य कठोर सत्य को धारण करने की सामर्थ्य की दीक्षा अर्जित कर लेगा, वह ‘जितेन्द्रिय’ की संज्ञा अर्जित कर लेगा; कारण कि मनुष्य ‘इन्द्रिय-निग्रह न कर सकने की स्थिति में ही प्रत्यक्षत:-परोक्षत: सत्य के प्रति मोह-भंगकर, ‘असत्य’ के साथ सामंजस्य स्थापित कर लेता है।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १२ अप्रैल, २०२० ईसवी)