औरत के नाम पर कलंक!

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

अभी कुछ दिनों-पूर्व गर्हित-कुत्सित-कलुषित-संदूषित- विकृत-बीभत्स-सी लगने-दिखनेवाली एक संस्कारविहीन औरत ने हमारे उन सेनानियों और विभूतियों के त्याग- बलिदान का घोर अनादर करते हुए, ऐसा कुविचार सार्वजनिक किया था, जिनके अथक संघर्ष और अदम्य के साहस के फलस्वरूप अपना देश स्वतन्त्र हो सका था। आज उस कुदर्शना की सर्वत्र भर्त्सना की जा रही है; परन्तु देश के सरकार बहादुर और उसके गैंग के प्रमुख लोग चुप्पी साधे हुए हैं। इससे सिद्ध होता है कि उस कुलटा कुलक्षिणी तथा चंचला ने सरकारी शह पाकर राजद्रोहात्मक कृत्य किया है। वही विचार यदि किसी प्रतिपक्षी दल की ओर से व्यक्त किया गया रहता तो आज देश में उथल-पुथल का साम्राज्य स्थापित हो जाता; आतंकी वातावरण से देश को आक्रान्त कर दिया जाता; किराये के टट्टू सरकारी ‘जय श्री राम’ के भयावह गूँज-अनुगूँज से जनजीवन के मन-प्राण को आतंकित कर दिये रहते तथा देश में विस्फोटक स्थिति बना दी गयी रहती।
उस राजद्रोही औरत ने मुग़लों के साथ पराक्रमी राजपूतों-राजपुतानियों के संग्राम की महत्ता को भुला दिया; उस पिशाचिनी ने राजपूतों की वीर बालाओं के जौहर पर पानी फेर दिया। वह चरित्रहीन औरत मेवाड़ की स्वाभिमानी परम्परा भूल गयी! वह रमणी वीर शिवा जी के पराक्रम को पलक झपकते अलक्षित कर गयी! भारत-चीन, भारत-पाकिस्तान के युद्धों के महत्त्व को विस्मृत कर गयी! ३ मई से २६ जुलाई, १९९९ ई० तक किये गये करगिल-युद्ध का उस दुरात्मना ने उपहास किया!
वह अभिसारिका देश के सरकारी तन्त्र का प्रश्रय पाकर इतना मनबढ़ हो चली है कि उसका नाम लेते ही वातावरण में एक व्याभिचारिक दुर्गन्ध फैलने लगती है।

बार-बार धिक्कार है, देश के उस शासक को जो सही अर्थों में सरकारी ‘दिव्यांग’ बना बेअसर दिख रहा है।

सीमा पर तैनात हमारे उन सैनिकों पर उस दुर्बुद्ध औरत के विषैले बोल से क्या गुज़र रही होगी, जो अहर्निश देश की आन-बान-शान की रक्षा के लिए प्रहरी की भूमिका में जी रहे हैं?
हमारे देश के न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश भी इस ओर से प्रतिक्रियारहित दिख रहे हैं और उच्चपदस्थ सैन्य अधिकारी भी।

देश के राष्ट्रपति के मुँह में भी ज़बान नहीं दिखती।

प्रश्न है, ऐसी मनमानी कब तक चलती रहेगी?

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १७ नवम्बर, २०२१ ईसवी।)