ऐ ज़िन्दगी! किस मोड़ पे, तूने छोड़ा था उसे

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

होठ बुदबुदाये, पर कुछ कह न सका,
भाव उमड़ाया, पर कुछ बह न सका।
विचार फैले इतने, बनके चादर हो गये,
सिकोड़े थे बहुत, पर कुछ तह न सका।
ज़ख़्म दिलो दिमाग़ के, नासूर बन गये,
दर्द दबाया बहुत, पर कुछ सह न सका।
मिलते रहे संदेश यहाँ, राम और रहीम के,
ज़ेह्न भरता रहा, पर कुछ गह न सका।
दिमाग़ी कूड़ा सारा, दर्या के हवाले किया,
बहा तो था ज़रूर, पर कुछ बह न सका।
लाभ का सौदा जो, करते आये हैं हरदम,
कोशिश की बहुत, पर कुछ लह न सका।
ऐ जिन्दगी! किस मोड़ पे, तूने छोड़ा था उसे,
साथ तो रहा, पर संग कुछ रह न सका।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १६ जनवरी, २०२२ ईसवी।