दुष्कर्मियों, हत्यारों तथा कदाचारियों के चंगुल मे देश के शिक्षणसंस्थान!..?

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

एक वह समय था, जब अध्यापक की सम्पूर्ण समाज मे सर्वाधिक मान-प्रतिष्ठा हुआ करती थी, तब शेष विश्व हमसे ज्ञान अर्जित करता था और उन दिनो ही यह उदात्त शब्दावली सुशोभित होती थी, “आचार्य देवो भव।” (‘भव:’ और ‘भव्’ अशुद्ध हैं।) एक समय आज का है, जब अध्यापक समाज की दृष्टि मे पतित होता आ रहा है। शोचनीय स्थिति है कि उस परिधि मे अध्यापकों का वह वर्ग भी आ चुका है, जो मेधासम्पन्न, अनुशासित तथा आत्माभिमान से युक्त है; परन्तु व्यवस्था के अत्याचार के विरुद्ध स्वर उठाने मे अक्षम, असमर्थ, लाचार तथा विवश रहकर कुण्ठाग्रस्त बना हुआ। ऐसा अध्यापकवर्ग भी उन्हीं आपराधिक कृत्यों का एक उपयोगी हिस्सा बनकर रह जाता है, जो शिक्षा-प्रशिक्षा को अपने घृणित कृत्यों से कलिमायुक्त करते आ रहे हैं, फिर भी सुयोग्य अध्यापकवर्ग गर्व से कहता है :– हम तो कर्त्तव्यपरायण हैं; हम तो योग्य हैं; हम उनमे से नहीं, जो और लोग हैं। धिक्कार है, उनकी क्लीव कर्त्तव्यपरायणता और योग्यता को, जो मात्र अपना और अपने परिवार का पेट पालने के लिए परोक्षत: अन्याय का एक हिस्सा बनकर रह जाते हैं।

केन्द्र और राज्य की सरकारों ने अध्यापकवर्ग की ऐसी दशा बना दी है कि वह शिक्षणसंस्थानो से घर पहुँचने के बाद ऐसी मन: स्थिति मे नहीं रहता कि स्वयं और स्वयं के परिवार के विषय मे सोच सके। वह ‘ऑफ़-लाइन’ पढ़ाये और ‘ऑन-लाइन’ भी; उसे मुख्यमन्त्रियों और अन्य प्रभावकारी नेता-नेत्रियों की सार्वजनिक सभाओं मे भीड़ का एक अनिवार्य हिस्सा बनाया जाये; उसे घर-घर जाकर सरकारी सूचना एकत्र करने का माध्यम बनाया जाये; उसे टोलों-मुहल्लों मे जाकर वहाँ के लोग से अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों मे पढ़ने के लिए प्रेरित करने के लिए एक उपकरण बनाया जाये; उसे अयोग्य, कुपात्र तथा कलुषित चरित्रवाले राजनेताओं के स्वागत मे ‘भीड़’ का हिस्सा बनने के लिए अनिवार्यत: बुलाया जाये; उसे पारिवारिक विवरण एकत्र करने के लिए इस मुहल्ले से उस मुहल्ले तक भेजा जाये; उसे तरह-तरह के टीकाकरण, पोलियो ड्रॉप्स पिलाने के लिए घर-घर भेजा जाये; इनके अतिरिक्त उसपर कई ऐसे दायित्वों का भार डाल दिया जाता है, जिससे दुष्प्रभावित होकर उसे अपने मूल कर्त्तव्यबोध ‘अध्ययन-अध्यापन’ का भान ही नहीं रह जाता। ऐसे मे, एकमात्र उपाय दिखता है, ऐसी शिक्षापद्धति का बहुविध ‘अन्तिम संस्कार’ कर दिया जाये।

छलछद्म चरित्रवाले-वाली अध्यापक-अध्यापिकाओं के पतनोन्मुख चरित्र और उनके आचरण की सभ्यता पिछले वर्षों मे हमने ‘कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालय’ की ऐतिहासिक जघन्य घटना को समीप से ख़ूब देख ली है।

उस घटनाक्रम ने समाजपटल पर सुस्पष्ट कर दिया है कि मात्र अध्यापक-अध्यापिका बनने के लिए व्यक्ति किस हद तक का ‘महापाप’ कर सकता है। ऐसे चरित्रहीन लोग अपने विद्यार्थियों के अन्त:करण मे कौन-सा जीवनमूल्य और संस्कार आरोपित करेंगे, इसे आसानी से समझा जा सकता है। छद्म शैक्षिक प्रमाणपत्रों के सहारे अध्यापक बननेवाले क्या कभी किसी समाज के लिए ‘श्रद्धेय’/ ‘आदरणीय’ हो सकते हैं? दो टूक उत्तर है, कदापि नहीं।
ऐसी स्थिति तब आती है जब अध्यापक अपने कर्त्तव्य से च्युत होता लक्षित होता है। एक बहुत बड़ी संख्या ऐसे अध्यापकों की है, जो वास्तव मे, नितान्त अयोग्य हैं। ऐसे लोग ‘रिश्वत’, ‘पहुँच’ तथा ‘प्रभाव’ के बल पर शैक्षिक उपाधियाँ (डिग्रियाँ) ख़रीद लेते हैं; बटोर लेते हैं और जो वास्तव मे, अर्हताप्राप्त सुपात्र और सुयोग्य अध्यापक होते हैं, उनके सीने पर वैसी कुत्सित कोटि का अध्यापकवर्ग मूँग दलते हुए, अपने अकर्मण्य और निरंकुश होने का परिचय देता रहता है। इस वास्तविकता को यदि समझना हो तो देश के किसी जनपद के शासकीय प्राथमिक-माध्यमिक शाला से लेकर विद्यालय, महाविद्यालय तथा विश्वविद्यालय मे पहुँच जाइए। वहाँ अध्यापक के नाम पर ऐसे अधिकतर चेहरे मिल जायेंगे, जो शैक्षिक अभियोग्यता के नाम पर शिक्षा-जगत् को कलंकित करते आ रहे हैं और वहीं पर ऐसे सुयोग्य अध्यापक भी हैं, जो मनसा-वाचा-कर्मणा शिक्षणशालाओं मे अध्ययनरत विद्यार्थियों के भविष्य सँवारने मे लगे हैं; परन्तु पतित व्यवस्था का एक अंग बनकर।

अध्यापक के नाम पर हाईस्कूल, इण्टरमीडिएट कॉलेजों, महाविद्यालयों तथा विश्वविद्यालयों में पढ़ानेवालों मे ऐसे लोग भी हैं, जो भरपूर वेतन पाते हैं, उसके बाद भी मानसिक स्तर पर दरिद्र बने रहते हैं और अपने मूल कार्य से विरत रहकर, ‘कोचिंग संस्थानो’ मे मुँह मारते देखे जाते हैं। इतना ही नहीं, विद्यार्थियों को अपने कोचिंग संस्थानो मे आने के लिए बहलाते, फुसलाते तथा धमकाते हैं। वैसे ही लोग विद्यार्थियों का अध्ययन-स्तर चौपट करने के लिए ‘गाइड’ के नाम पर ‘सड़कछाप’ प्रश्नोत्तरी लिखते आ रहे हैं। वैसी मानसिकतावाले-वाली अध्यापक-अध्यापिका वही हैं, जो बोर्ड की परीक्षाओं के समय उत्तरपुस्तिकाओं का परीक्षण और मूल्यांकन करते समय अधिक-से-अधिक उत्तरपुस्तिकाओं का मूल्यांकन कर, रुपये बनाने के लिए भरपूर लापरवाही के साथ परीक्षक की कुभूमिका का निर्वहण करती आ रही हैं। इतना ही नहीं, ऐसा ही अध्यापकवर्ग प्रायोगिक परीक्षाओं में मेधावी विद्यार्थियों के साथ अन्याय करके, लेन-देन की व्यवस्था के आधार पर परीक्षक बना हुआ है।

विश्वविद्यालयों और संघटक महाविद्यालयों के एक सामान्य अध्यापक से लेकर प्रधानाचार्य और कुलपतियों तक मे ऐसे बहुसंख्य लोग हैं, जिनके शर्मनाक आचरण से शिक्षा की गरिमा कलंकित होती आ रही है। स्वार्थ और परिचय-पहुँचवाद मे आकण्ठ डूबे ऐसे लोग, जिस कार्य के लिए नियुक्त किये जाते हैं, उसके प्रति न्याय नहीं कर पाते; बल्कि अपने चेहरे पर कभी न मिटनेवाली कालिख़ जाने-अनजाने पोतते आ रहे हैं।

इन सबसे भयावह और कलंकमयी वे घटनाएँ हैं, जिनमे प्राथमिक शाला से लेकर विश्वविद्यालय तथा प्राविधिक (तकनीकी/प्रौद्योगिकी) संस्थानो मे वहाँ के अध्यापकों, प्रबन्धकों तथा शिक्षणेतर (‘शिक्षणेत्तर’ अशुद्ध है।) कर्मचारियों-द्वारा छात्राओं के साथ पारस्परिक सहमति और बलप्रयोग के आधार पर व्यभिचार और शारीरिक दुष्कर्म शामिल हैं। इतना ही नहीं, शिक्षणसंस्थानो के भीतर बालिकाओं, किशोरियों तथा युवतियों के साथ सामूहिक व्यभिचार और बलात्कार के बाद साक्ष्य मिटाने के लिए जिस तरह से उनकी हत्या कर दी जा रही है, वह हतप्रभ कर देनेवाली स्थिति है। आश्चर्य का विषय है, उन अमानवीय घटनाओं को दबाने के लिए सम्बन्धित सभी प्रकार के प्रशासन अपनी सारी शक्ति झोंक देते हैं। यही नहीं, उन घटनाओं मे उनकी संख्या सर्वाधिक है, जिनके सिर पर सम्बन्धित राज्यों की सरकारों का वरद्हस्त बना हुआ है। ऐसे मे, प्रश्न का बलपूर्वक उठ खड़ा होना स्वाभाविक है, ऐसा कब तक होता रहेगा?

इन दिनो देश के विश्वविद्यालयों, विशेषत: उत्तर-भारत के विश्वविद्यालयों की स्थिति अति गम्भीर है। वैसे तो देश मे एक भी कुलपति ऐसा नहीं है, जिसने किसी अध्यापक को मूल कर्म ‘अध्यापन’ मे लापरवाही बरतने के लिए कभी दण्डित किया हो। क्या कारण है, किसी महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों मे क्रमश: नये कुलपति और प्रधानाचार्य के आते ही अध्यापकों और अध्यापकेतर कर्मचारियों के दो वर्ग बन जाते हैं :– पहला वर्ग, कुलपति और प्रधानाचार्य का चहेता-चहेती बन जाता है और दूसरा वर्ग, कुलपति-विरोधी। यहीं से महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में शेष रहे अनुशासन की भी उलटी गिनती शुरू हो जाती है। ऐसे मे, कुलपतियों और प्रधानाचार्यों की एक आँख फूटी रह जाती है; वह ‘एकाक्षी’ रहकर व्यवस्था को ताकता रहता है।

अधिकतर विश्वविद्यालय ऐसे हैं, जहाँ कुलपति और कुलसचिव मे मुठभेड़ होती रहती है, ऐसा क्यों? वहीं ऐसे कुलपतियों की बड़ी संख्या है, जो कुछ महाविद्यालयों के प्रधानाचार्यों की चमचागिरी से इतने प्रभावित रहते हैं कि उनकी सेवानिवृत्ति के समय के बाद भी सेवा जारी रखते हैं। इतना ही नहीं, यदि उनमे से किसी प्रधानाचार्य की ‘प्रधानाचार्य पत्नी’ भी सेवानिवृत्ति के बाद किसी कुलपति की कृपा पा जाती हो तो इसे क्या कहा जायेगा? बहुत सारी विसंगतियाँ हैं, जो कुलपति और प्रधानाचार्य के पतित आचरण की पटकथा लिखती आ रही हैं। क्या किसी विश्वविद्यालय के/की कुलपति का यही कर्त्तव्य है कि अंगरक्षकों और सुरक्षाकर्मियों के साये मे बना/बनी रहे और सामान्य विद्यार्थियों के साथ किये जा रहे अन्याय के विरुद्ध मूकदर्शक रहे? ऐसे कुलपति का यह कर्त्तव्य नहीं है कि वे अपने विश्वविद्यालय और संघटक महाविद्यालयों की अध्ययन-अध्यापनपद्धतियों को समझने के लिए स्वयं की भूमिका का निर्वहण करें? वे अपने से सम्बन्धित समस्त छात्रावासों मे महीने-दो महीने के नियमित अन्तराल पर जाकर छात्र-छात्राओं के साथ संवाद कर, उनकी कठिनाइयों को समझते हुए, उन्हें दूर करने की दिशा मे स्वस्थ क़दम उठाये? पुस्तकालयों, प्रयोगशालाओं आदिक मे उचित व्यवस्था है वा नहीं, इसकी जानकारी लेकर अभाव की पूर्ति कराये, इसके प्रति भी हमारे कुलपति सजग क्यों नहीं हैं? सच तो यह है कि अब देश के कुलपति अपनी योग्यता के बल पर नहीं, अपितु ‘सरकारी चाटुकारिता’, ‘उत्कोच’ (रिश्वत), ‘पहुँच’ तथा ‘प्रभुत्व’ की ‘योग्यता’ दिखाकर विश्वविद्यालय के कुलपति बनाये जाते रहे हैं। इसे समझने के लिए सम्बन्धित कुलपतियों की शैक्षिक योग्यता और लेन-देन की प्रक्रियाओं के साथ जुड़ना होगा।

वर्ष मे महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों के अध्यापक कितने महीने अपनी-अपनी कक्षा में जाकर विद्यार्थियों को पढ़ाते हैं? वर्ष मे कितने माह ऐसे अध्यापक सम्मेलन-समारोहों-समितियों की शोभा बढ़ाकर विद्यार्थियों के अध्यापन-कर्म के समय मे डाका डाल कर, अपनी जेब भारी करते हैं? ऐसी अध्यापक-अध्यापिकाएँ अपनी अयोग्यताओं के बावुजूद चयन-समितियों, आयोगों, निदेशालयों आदिक के पदाधिकारी, सदस्य आदिक कैसे और क्यों बनायी जाती रही हैं? इन प्रश्नो के उत्तर तलाशने का वास्तविक दायित्व कुलपति का बन जाता है, न कि ए० सी०-महल मे टाँग-पर-टाँग पसारे बैठे रहकर हुक़्म जताने का।

अकर्मण्य और निहायत धूर्त्त अध्यापक-अध्यापिकाओं मे ऐसे भी हैं, जो कोचिंग-संस्थानों मे स्नातक-स्नातकोत्तर तथा प्रतियोगितात्मक विद्यार्थियों पढ़ाते हैं। निजी महाविद्यालयों मे परीक्षाओं की अवधि मे ‘उड़न दस्ता’ के सदस्य बनने के लिए ऐसे अध्यापक सिफ़ारिशें कराते हैं और वहाँ पहुँचकर ‘मोटी रक़्म’ (रक़म/रकम अशुद्ध है।) पर हाथ साफ़कर नक़्ल को परवान चढ़ने देते हैं। इस तरह से शिक्षामन्दिर का बाज़ारीकरण करनेवाले ऐसे कलुषित अध्यापक वर्णनातीत घृणा और भर्त्सना के पात्र हैं।

बेशक, निष्ठावान अध्यापक के साथ यही चरितार्थ होता है :– एक मरी मछली सारे तालाब को गन्दा कर देती है।
अन्त मे, सभी प्रश्नो के निचोड़ से एक महाप्रश्न का जन्म होता है– ऐसा कब तक होता रहेगा?

(आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ७ जुलाई, २०२३ ईसवी।)