● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
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विगत दो दशक से जिस तरह से शिक्षा-परिषदोँ मेँ अधिकतर विद्यार्थियोँ को ८० से १०० प्रतिशत अंक दिये जाते रहे हैँ, उससे उतने अंक पानेवाले वे विद्यार्थी भी आश्चर्यचकित रह जाते हैँ। ऐसा इसलिए कि उनमे से अधिकतर ‘अर्ह’ (अभियोग्य) हैँ ही नहीँ। इसे सम्बन्धित विद्यार्थी अच्छी तरह से जानते हैँ और उनके माँ-बाप, अभिभावक, शिक्षक आदिक भी। इसके लिए एक सिरे से देश की अव्यावहारिक शिक्षा-दीक्षा तथा विकृत परीक्षा-परीक्षणपद्धतियाँ दोषी सिद्ध होती आ रही हैँ।
किसी शिक्षा-परिषद् की ओर से आयोजित परीक्षाओँ मे जितने विद्यार्थियोँ ने ८० से १००% तक अंक बटोरे हैँ, उससे उन्हेँ, उनके माँ-बाप और अभिभावकोँ को फूलकर कुप्पा होने की आवश्यकता नहीँ है; क्योँकि उन्होँने अभी तक तो बहुत ही आसानी से ‘बहती गंगा’ मे हाथ धो लिये हैँ; ललकार (चुनौतियाँ) अभी आगे आनेवाले हैँ, जिनका सामना करते समय फोकट मे पाये अंक काम नहीँ करेँगे। जो वास्तव मे, ‘विद्यार्थी’ होँगे, वही सफल होँगे, शेष औँधे मुँह गिरेँगे, यह भी सुनिश्चित है। क्षणिक वाहवाही लूटने के लिए शासन और शिक्षा-परिषदोँ के निर्देश पर अंक लुटाये जा रहे हैँ। ‘स्टेप मार्किंग’ की गर्हित पद्धति समाप्त की जानी चाहिए।
बेशक, कुकुरमुत्तोँ की तरह से समूचे देश मे, विशेषत: उत्तर-भारत मे जिस तरह से निजी महाविद्यालयोँ और विश्वविद्यालयोँ मे लाचारीवश जो लोग पढ़ने और पढ़ाने का काम कर रहे हैँ, यह तथ्य किसी से छिपा नहीँ है। रिश्वत के बल पर सभी विद्यार्थियोँ को फ़र्ज़ी तरीक़े से अत्युत्तम और सर्वोत्तम अंक देकर कथित प्रकार की शिक्षण-संस्थाएँ अपनी पीठ ठोँकती आ रही हैँ; परन्तु छाती नहीँ ठोँक पातीँ, कारण कि ऐसी संस्थाएँ ‘चोरी-चमारी’ और ‘चोरी-चकारी’ के बल पर व्यावसायिक और भौतिक समृद्धि पा रही हैँ, आत्मिक स्तर पर नहीँ। इसे समझना हो तो बी० टी० सी० मे अंकोँ के आधार पर प्रवेश करने की जो प्रक्रियाएँ हैँ, उन्हेँ समझना होगा। उसके अन्तर्गत ग्रामीण क्षेत्रोँ के अधिकतर विद्यार्थी सहजतापूर्वक प्रवेश कर जाते हैँ और जो विद्यार्थी सुयोग्य होते हुए भी अपेक्षाकृत कम अंक पाने के कारण प्रवेश पाने से वंचित रह जाते हैँ, उनके साथ अन्याय का होना साफ़-साफ़ दिखता है। उन प्रतिभावान् विद्यार्थियोँ का अपराध यह होता है कि वे किसी ऐसे मानक विश्वविद्यालय और उसके संघटक महाविद्यालयोँ मे पढ़ते हैँ, जहाँ पारदर्शितापूर्वक परीक्षाएँ करायी जाती हैँ।
अब विविध शिक्षा-परिषदोँ की ओर से घोषित परीक्षाफल चौँकानेवाले सिद्ध तो हो ही चुके हैँ, देश मे बेरोज़गारोँ की एक बड़ी फ़ौज अदृश्य रूप मे खड़ी भी हो चुकी है, जो ‘कल’ की तारीख़ मे प्रत्यक्ष होते दिखेगी। उन्हीँ मे से कई ऐसे होँगे, जो बेरोज़गारी की स्थिति मे अपराध की दुनिया मे प्रवेश करेँगे, जबकि कई लाचारगी का जीवन जीते हुए, सरकारी व्यवस्था को कोसेँगे और अपना माथा पकड़कर अपने भाग्य को सम्बोधित करते हुए मिलेँगे। इतना ही नहीँ, लगातार विफलता के कारण आत्मघाती क़दम उठाते हुए भी दिखेँगे, जिसकी तीव्रतापूर्वक शुरूआत (‘शुरुआत’ अशुद्ध है।) हो चुकी है। अख़बारात की सुर्ख़ियाँ बनती दिख रही हैँ और ‘मुक्त मीडिया'(सोशल मीडिया) पर लोग शोकायोजन करते भी दिख रहे हैँ।
अभी हाल ही मे सत्तापक्ष की ओर से लोकसभा मे जो आँकड़े प्रस्तुत किये गये हैँ, वे बताते हैँ कि वर्ष २०१४-१५ और वर्ष २०२३-२४ के मध्य शासकीय पाठशालाओँ और विद्यालयोँ (स्कूल और कॉलेज) की संख्या ११,०७,१०१ से घटकर १०,१७,६६० हो गयी है, जबकि निजी पाठशालाओँ और विद्यालयोँ की २,८८,११४ थी, जो अब बढ़कर ३,३१,१०८ हो गयी है। गम्भीर विषय यह है कि उपर्युक्त अवधि मे ही भारत मे ८९,४४१ शासकीय पाठशालाएँ और विद्यालय बन्द किये जा चुके हैँ। भारत मे लगभग १५ लाख पाठशालाएँ और विद्यालय हैँ, जो विश्व के सर्वाधिक पाठशाला और विद्यालयवाले देशोँ मे से एक है, जिनमे से ६८.७ प्रतिशत शासकीय हैँ और ३१.३ प्रतिशत निजी संस्थान के। अब प्रश्न उठता है :– भारत के कितने राज्य अपनी शिक्षा-व्यवस्था के प्रति गम्भीर हैँ? इसका उत्तर उच्च शिक्षा-विषयक नीति-आयोग के प्रतिवेदन के एक भाग मे मिल जाता है, जिसमे बताया गया है कि जम्मू-कश्मीर शिक्षा पर व्यय करने मे सबसे आगे है; क्योँकि वह शिक्षा पर ८.११ प्रतिशत व्यय करता है; दूसरे स्थान पर मणिपुर है, जहाँ की सरकार ७.२५ व्यय करती है, जबकि दिल्ली बहुत पिछड़ा है, जहाँ शिक्षा के लिए १.६७ प्रतिशत व्यय किया जाता है।
केन्द्र और राज्य-सरकारेँ नौकरी देने मे साफ़ असमर्थ दिख रही हैँ। कई राज्योँ, विशेषत: उत्तरप्रदेश-सरकार अपनी कई हज़ार पाठशालाएँ बन्द कर चुकी है और अभी और करने जा रही है। वैसे भी देश का मुख्य राज्य उत्तरप्रदेश साक्षरता-दर मे अभी बहुत पीछे है, जिसके कई मुख्य कारण हैँ। जैसे– सरकार की ढुलमुल शिक्षानीति, शिक्षाधिकारियोँ मे पाठशालाओँ के प्रति मोह और अपनत्व का अभाव, पाठशालाओँ का दूर होना, पाठशालाओँ तक जाने के लिए समुचित वाहन-व्यवस्था का अभाव, शासकीय पाठशालाओँ के समीप ही सुविधा-साधन से युक्त निजी पाठशालाओँ का संचालन, सामाजिक सुरक्षा का प्रश्न, बढ़ते अपराध और बेटे-बेटियाँ आदिक।
आज केन्द्र और राज्य-सरकारेँ ‘जनसंख्या’ का दबाव झेल रही हैँ, जिसके कारण वे अपनी ठोस नीतियोँ के अभाव मे किंकर्त्तव्यविमूढ़ दिख रही हैँ। जनसंख्या पर नियन्त्रण पाने के लिए उनके पास न कोई ठोस कार्यनीति है, न योजना और न ही रणनीति; परन्तु खेद है, सरकारेँ प्रकारान्तर से बेरोज़गारी को बढ़ावा देती आ रही हैँ।
‘नीट’, ‘जे० ई० ई०’ तथा विभिन्न प्रकार की अन्य प्रतियोगितात्मक परीक्षाएँ ९० से १०० प्रतिशत अंक पानेवाले विद्यार्थियोँ के लिए एक दुर्दान्त चुनौती सिद्ध हो सकती हैँ; क्योँकि वहाँ भी कदाचार का अजगर फन उठाये नाचता दिख रहा है। उस स्तर पर भ्रष्टाचार नहीँ दिखेगा, जिस स्तर पर हाइस्कूल, इण्टरमीडिएट तथा स्नातक-स्तर पर दिखता आ रहा है। किस तरीक़े से परीक्षा से पूर्व ही प्रश्नपत्र सार्वजनिक करा दिये जा रहे हैँ; परीक्षार्थियोँ को विधिवत् नक़्ल करने-कराने के लिए विशेष सुविधाएँ उपलब्ध करायी जा रही हैँ। ऐसे कुत्सित और अवैध परीक्षायोजन मे रुपयोँ के बल पर प्रश्नपत्रोँ का क्रय-विक्रय-चरित्र अब जगज़ाहिर हो चुका है। हम इसे हाल ही मे गुजरात और हरियाणा-राज्योँ मे देख चुके हैँ।
जो भी विद्यार्थी अपनी वास्तविक योग्यता के विपरीत अंक बटोरते आ रहे हैँ, उनके लिए आगे की सफलता “टेढ़ी खीर” सिद्ध होनी ही है, इससे इन्कार नहीँ किया जा सकता।ऐसी ‘अंकलुटाऊ-पद्धति’ केन्द्र और राज्य-सरकारोँ के “गले की हड्डी” बनेगी ही, सरकारेँ इससे भी आँखेँ नहीँ चुरा सकतीँ।
‘सेण्टर फॉर मॉनिटरिंग इण्डियन इकॉनमी’ (सी० एम० आइ० ई०) के प्रतिवेदन के अनुसार, वर्तमान मे भारत की बेरोज़गारी-दर २३.५ % तक पहुँच चुकी है, जो कि अत्यन्त भयावह है। उक्त परिषदोँ की परीक्षाओँ मे यदि प्रतिवर्ष ८०-९० प्रतिशत विद्यार्थी उत्तीर्ण होने लगेँगे तो सबकी नौकरी लग पायेगी, यह सुनिश्चित करना सम्भव ही नहीँ है।
नवीनतम जनगणनावर्ष २०११ मे भारत की साक्षरता-दर ७४.४ प्रतिशत थी, जोकि विश्व की साक्षरता-दर से ८४ प्रतिशत कम है। भारत मे साक्षरता के मुआमले मे महिला-पुरुष मे पर्याप्त अन्तर है। जहाँ महिलाओँ की साक्षरता-दर ६५.४६ है, वहीँ पुरुषोँ की ८२.१४।
यदि कोई प्रश्न करता हो :– भारत मे कितने प्रतिशत शिक्षित लोग बेरोज़गार हैँ तो उत्तर कष्टकारक प्राप्त होगा; क्योँकि वर्ष २०२२-२३ मे नगरीय शिक्षित महिलाओँ की बेरोज़गारी-दर १३.७ प्रतिशत थी, जबकि यही दर पुरुषोँ के लिए ६.८ प्रतिशत। सिविल इंजीनियरिंग की शिक्षा प्राप्त लोग अधिक बेरोज़गार हैँ; क्योँकि उनकी संख्या ५४.३ प्रतिशत है। सांख्यिकी-मन्त्रालय के नवीनतम ‘आवधिक श्रम-बल सर्वेक्षण’ (पी० एल० एफ० एस०) के अनुसार, मई, २०२५ ई० तक भारत की बेरोज़गारी-दर बढ़कर ५.६ प्रतिशत हो जायेगी, जो ग्रामीण और नगरीय क्षेत्रोँ से जुड़ी हुई है। अभी इसका नवीनतम पुष्ट आँकड़ा आना शेष रह गया है। इससे १५ वर्ष की किशोर-किशोरियोँ से लेकर २९ वर्ष के युवावर्ग सर्वाधिक प्रभावित होते देखे जा रहे हैँ। जहाँ ग्रामीण किशोर-किशोरी और युवावर्ग की बेरोज़गारी बढ़कर १३.७ प्रतिशत हो गयी है, वहीँ उनकी नगरीय बेरोज़गारी-दर १७.९ प्रतिशत तक पहुँच गयी है। केन्द्र और राज्य-सरकारोँ के लिए लज्जा का विषय है कि भारत मे ८३ प्रतिशत युवा बेरोज़गार हैँ। स्नातकोत्तर-उपाधिधारकोँ और उससे ऊपर की उपाधिधारकोँ की बेरोज़गारी-दर लगभग १४ प्रतिशत है, जबकि स्नातक-उपाधिप्राप्त लगभग १९ प्रतिशत लोग बेरोज़गारी का दंश झेल रहे हैँ। इससे सुस्पष्ट हो जा रहा है कि भारत मे परिव्याप्त बेरोज़गारी का विषैला वातावरण किशोर-किशोरी और युवावर्ग को ”नख-शिख” अपनी परिधि मे ले चुका है। ऐसे मे, देश की बेरोज़गारी यदि परवान चढ़ती है तो इसमे दोष किसका?
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