प्रेम की अनुभूति

प्रेम तुम्हारी धन्यता का अनुभव है।
जिसे भी अपने हृदय में प्रेम की अनुभूति होती है, उसका जीवन धन्य हो जाता है।

प्रेम का अनुभव ही पहली बार मानव जीवन के महत्त्व को व्यक्त करता है।

प्रेम की अनुभूति होते ही मानव अपने जन्म पर गर्व करता है।

प्रेम तुमको स्वयं से स्वयं में तृप्त करता है।
हृदय में प्रेम जागते ही तुम सुख के लिए आत्मनिर्भर होने लगते हो।

सुख की बाहर से याचना समाप्त होने लगती है।

प्रेम ही वास्तव में सुख है, आनंद है, मस्ती है।

प्रेम जागने पर मदिरा व्यर्थ हो जाती है।
मदन व्यर्थ हो जाता है।
मैथुन व्यर्थ हो जाता है।

प्रेम की तरंग उस रस को जन्म देती है जिसका कोई बाहरी स्रोत नहीं और जो अकारण है।

वास्तव में अकारण आनंद ही प्रेम है।

प्रेम ईश्वर के समीप ले जाता है।
प्रेम सत्य का पाठ पढ़ाता है।
प्रेम अद्वैत का भाव जगाता है।
प्रेम मैं-तू का संयोग कराता है।
प्रेम ही धैर्य, धारणा, व्रत, श्रद्धा, संकल्प, शपथ, प्रतिज्ञा, वचनबद्धता की सामर्थ्य जगाता है।
प्रेम आंखों में वास्तविक आंसू जगाता है।
प्रेम जीवन को सक्रिय, सुंदर, मधुर और स्वच्छ बनाता है।
प्रेम अनुशासन और भक्ति सिखाता है।
प्रेम कर्तव्य और उत्तरदायित्व की अनुभूति देता है।
प्रेम ही आकाश में ऊंची उड़ान के पंख उगाता है।

राम गुप्ता, स्वतंत्र पत्रकार, नोएडा