प्रेम ही संसार को सुखी बनाता है

दूसरे से जुड़ने और उसकी महिमा में खो जाने की इच्छा ही प्रेम है।
इससे ही संवेदना जागती है, सरलता और विनम्रता आती है।

दूसरे को स्वीकार करवाती है यह प्रेम की तड़प।
दूसरे के संपर्क से ही ऊर्जा का जागरण होता है इसी से हृदय में प्रेम का विकास होता है।
इस प्रेम से ही जगत में दिव्य व्यवहार सम्भव होता है।

वास्तविक प्रेम इसी सत्य के बोध से जागेगा कि संसार में दूसरा कोई नहीं सब एक के ही विस्तार है अतः दूसरे को स्वीकार करो तिरस्कार नहीं।

यही प्रेम है इसी प्रेम से स्वतः सम्बन्ध और अनुशासन पनपता है।

अपनी समस्त इच्छाओं को दूसरे की इच्छा में घुला देने की चेष्टा ही वास्तविक प्रेम है।

जब भी यह वास्तविक प्रेम जागता है तभी वास्तविक संबंधों का उदय होता है संसार में।
यह प्रेम ही संसार को सुखी बनाता है।

✍️🇮🇳 (राम गुप्ता, स्वतन्त्र पत्रकार, नोएडा)