आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
‘नोट-परिवर्त्तन’ (नोटबन्दी), ‘जी०एस०टी०’, ‘अघोषित मूल्यवृद्धि’ आदिक कृत्यों के परिणाम देश के सम्मुख नकारात्मक रूप मे आ चुके हैं। जो भी लाभ मिला, वह सरकार के राजस्व के पक्ष मे रहा और देश-नेतृत्व निरंकुश बना रहा; परन्तु यह निश्चित है कि बी०जे०पी० को उसकी क़ीमत चुकानी पड़ेगी, आज नहीं तो कल; दूसरी ओर, देश का विपक्ष नितान्त शिथिल है। देश मे महँगाई प्रतिदिन जिस गति मे बढ़ती जा रही है, उसके प्रति भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस और अन्य विपक्षी दल कान मे तेल डाले सोये हुए हैं।
समाजवाद और लोहिया के नाम पर अब तक ठगी करनेवाले चेहरों पर चढ़े मुखौटों को ओचाड़ फेंकना होगा। साम्यवाद के नाम पर ‘आत्मवाद’ की ओछी राजनीति करनेवालों को दर-किनार करके राष्ट्रवादी चिन्तकों को राजनीति मे लाना होगा। ‘दलित’ शब्द के नाम पर निहायत गर्हित राजनीति करनेवाली/ वालों को अपदस्थ कर, समदर्शितापूर्ण आचरण प्रस्तुत करना होगा। यदि ऐसा नहीं हुआ तो सामान्य जन को वर्तमान सत्ताधारियों के विरुद्ध ‘क्रान्ति’ का बिगुल बजाने के लिए तत्पर रहना होगा।
बी०जे०पी० की नीति अब सुस्पष्ट हो चुकी है :– ग़रीब की कमर तोड़कर उसके कटोरे मे मुफ़्त की रोटियाँ फेंककर अपने पीछे-पीछे घूमने के लिए बाध्य और विवश कर दो; मध्यम-वर्ग को आपस मे बाँट दो, ताकि सत्ता के विरोध मे उनके स्वर उठ न सकें; हिन्दू-मुसलिम धर्म का विकृत रूप उपस्थित कर दो, ताकि दोनो आपस मे लड़ते-कटते-मरते रहें। दलित जाति को अन्य जातियों के समकक्ष ला दो, ताकि वे आपस मे संघर्षण करते रहें और उसका लाभ सरकार को मिलता रहे। वर्तमान सरकार की सुस्पष्ट नीति है कि समाज मे इतना विघटन कर दो और उसे इतना निरुपाय कर दो कि सत्ताधारियों की निरंकुशता वह सहन करने के लिए विवश बना रहे और सत्ताधारी दोनो हाथों से उसका दोहन करते रहें।
औद्योगिक वर्ग को प्रोत्साहन देनेवाली वर्तमान सरकार कृषक-वर्ग के लिए नितान्त अहितकर सिद्ध हो रही है। इस सरकार ने सभी नियमो को ताक़ पर रखकर देश के शीर्षस्थ उद्योगपतियों को ऋण देकर अपनी मंशा ज़ाहिर कर दी है कि वह धनपशुओं के हाथों खुलकर खेल रही है। यही कारण है कि देश का वह वर्ग, जो ज़रूरतमन्द है और आर्थिक सहायता अथवा ऋण से अपनी स्थिति सुधारना चाहता है, उसके सामने सरकार स्वयं को ‘भिखारी’ के रूप मे प्रस्तुत करती आ रही है। पहली ओर, सरकार अपनी असहायता प्रकट करते हुए कहती है :– हमारी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि हम किसी को सरकारी नौकरी दे सकें और नये पद बना सकें और दूसरी ओर, गिने-चुने उद्योगपतियों की झोली मे ऋणरहित अकूत धनराशि डलवाये जा रही है। यही कारण है कि सरकार की वर्तमान आर्थिक नीति देश के करोड़ों अनियोजित युवाओं के भविष्य को नष्ट कर रही है; आयात-निर्यात की नीतियों मे असमानता स्पष्टत: दृष्टिगोचर हो रही है तथा महँगाई थमने का नाम नहीं ले रही है। समानान्तर अर्थव्यवस्था (काला धन) का वर्तमान सरकार वैधानिक रूप मे पोषण करती दिख रही है। सरकार बनने के १०० दिनों के भीतर ताल ठोंककर विदेशों से काला धन लाने की बात करनेवाले नरेन्द्र मोदी की सरकार के गठन हुए लगभग ९ वर्षों से भी अधिक की अवधि हो चुकी है; परन्तु उसके बाद भी यथास्थिति बनी हुई है, जो निर्लज्जता की पराकाष्ठा है।
सच तो यह है कि वर्तमान सरकार की राष्ट्रघाती आर्थिक नीतियों से देश के करोड़ों युवा बेरोज़गार बुरी तरह से आहत हैं; संघटित-असंघटित क्षेत्रों मे रोज़गार की कहीं-कोई सम्भावना नहीं दिख रही है। लघु और मध्यम स्तर के उद्योग दम तोड़ रहे हैं; निजी क्षेत्रों से लाखों लोग बेरोज़गारसहित किये जा चुके हैं। केन्द्र-सरकार की सेवा-नीतियों से सुस्पष्ट हो चुका है कि उसके पास नौकरी नहीं है; पिछले चार वर्षों मे बेरोज़गारी की स्थिति अत्यन्त शोचनीय हो चुकी है।
‘प्यू रीसर्च’ की रिपोर्ट बताती है कि वर्ष २०२१ की शुरुआत से अब तक ३ करोड़ से अधिक लोग अपनी नौकरी गँवा चुके हैं और ८ करोड़ से अधिक लोग गरीबी-रेखा पर पाँव रख चुके हैं, जिनमे से १० करोड़ मध्यमवर्ग का एक-तिहाई सम्मिलित है। उल्लेखनीय है कि भारत मे प्रतिवर्ष लगभग २ करोड़ नौकरियों की ज़रूरत है, जबकि प्रतिवर्ष केवल ४३ लाख नौकरियाँ दिखती हैं।
‘मोदी ऐण्ड कम्पनी’ ने जब ‘मेक इन इण्डिया’ की शुरुआत की थी तब यह माना जा रहा था कि देश से लाला फ़ीताशाही का अन्त करके और निर्यात-केन्द्रों से निवेश आकर्षित करके भारत को वैश्विक उत्पादन का ‘पॉवर हाउस’ बना दिया जायेगा; परन्तु वह मात्र ‘लालटेन’ बनकर रह गया है। हम यदि ‘सेण्टर फॉर डेटा ऐण्ड एनालिसिस’ के आँकड़े पर भरोसा करें तो निजी क्षेत्र और मैनुफैक्चरिंग की नौकरियाँ अब आधी से भी कम हो चुकी हैं।
आज भारत और प्रत्येक भारतवासी ‘वर्ल्ड बैंक’ का कितना क़र्ज़दार है, सरकार आँकड़ा जारी करे। तथाकथित नोटबन्दी के बाद से सरकार को कितनी आय हुई है, इसे सरकार आज तक नहीं बता पायी है। ऐसा इसलिए कि उसकी नीयत की खोट जग-ज़ाहिर हो चुकी है। ‘अन्तरराष्ट्रीय मुद्राकोष’ से भारत की सरकार ने अपने देशवासियों की आर्थिक उन्नति के लिए अब तक कितनी सहायता-राशि, अनुदानराशि, ऋणराशि इत्यादिक ली है, इसे वह उजागर करे।
आज हम यदि देश की कुल जनसंख्या १४० करोड़ मान लें तो देश की प्रत्येक जनता पर सरकार की ग़लत आर्थिक नीतियों के कारण ₹१ लाख से अधिक का ऋण है, जबकि वर्ष २०१४ मे १३० करोड़ की जनसंख्या पर ₹४२ हज़ार था। यही ऋण यदि भारत-सरकार पर देखें तो ज्ञात होगा कि उसपर कुल ₹१५५ लाख करोड़ का ऋण हो चुका है। भारत के वित्तमन्त्रालय के अनुसार, भारत का विदेशी ऋण मार्च, २०२२ ई० के अन्त मे एक वर्ष पहले की तुलना मे ८.२ प्रतिशत बढ़कर ₹६२०.७ अरब डॉलर हो गया है। यह भी ग़ौर करने-लायक़ है कि आज़ादी के बाद से अब तक विदेश से सर्वाधिक ऋण लेने का कीर्तिमान प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी स्थापित कर चुके हैं।
प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी अब तक लगभग ७० देशों की यात्राएँ कर चुके हैं। उन यात्राओं में अब तक कितने अरब रुपये अथवा जो भी धनराशि व्यय की गयी है, उसे सार्वजनिक करें; क्योंकि इसे प्रत्येक भारतवासी को जानने का हक़ है। सरकार की योजनाओं के औचित्यविहीन विज्ञापनों मे देश की जनता की कितनी धनराशि का अपव्यय किया गया है, उसे सरकार उजागर करे।
वर्तमान सरकार देश और देशवासियों का आर्थिक दोहन करने मे पूरी तरह से लगी हुई है, जो देश को आर्थिक ग़ुलामी की ओर ले जाने का एक षड्यन्त्र के रूप में दिख रहा है।
(सर्वाधिकार सुरक्षित― आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ९ जुलाई, २०२३ ई०।)