एक सौ इक्कीस वर्षों का अन्तराल सोने की चमक से धन्य होता हुआ!

नीरज चोपड़ा ने भारत को स्वर्णमय बनाया!

★समीक्षक– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

७ अगस्त, २०२१ ई० का दिन हर भारतीय के लिए स्वर्णिम रहा और गौरवपूर्ण भी। इस ऐतिहासिक क्षण को उपलब्ध कराने का श्रेय जाता है, पानीपत (हरियाणा) के एक ऐसे एथलीट को, जिसने अर्हता-प्राप्ति के लिए आयोजित प्रतियोगिता के प्रथम प्रयास में ही ८६.६५ मीटर भाला (जेवेलिन) प्रक्षेपित कर विश्व के खिलाड़ियों की आँखें अपनी ओर स्थिर करने के लिए बाध्य कर दिया था; क्योंकि उन्होंने अर्हता-प्राप्ति के ग्रुप ‘ए’ और ‘बी’ को मिलाकर प्रथम स्थान अर्जित किया था। उस एथलीट का नाम नीरज चोपड़ा है, जिन्होंने ‘ग्रुप ए’ में शीर्ष पर अपना स्थान बनाये रखा था। वे बार-बार इस सम्भावना को प्रबलतर किये जा रहे थे– स्वर्णपदक मेरे अलावा कोई अन्य खिलाड़ी जीत ही नहीं सकेगा; अन्तत:, हुआ भी वही। फ़ाइनल के छ: चक्रों में भारत के २३ वर्षीय भालाप्रक्षेपक नीरज चोपड़ा ने अपने भाले के माध्यम से सर्वाधिक दूरी ८७.५८ मीटर तय कर खेलविश्व को आश्चर्यचकित कर दिया था। उसी ऐतिहासिक दूरी के आधार पर उन्हें ‘स्वर्णपदक’ का विजेता घोषित किया गया था। नीरज ने अपने स्वर्णपदक को सार्वकालिक महान् भारतीय एथलीट (धावक) मिल्खा सिंह को समर्पित करते हुए कहा है, “मैं अपने ‘गोल्ड मेडल’ को महान् मिल्खा सिंह को समर्पित करता हूँ। वे शायद मुझे स्वर्ग से देख रहे होंगे। मैं अपने मेडल के साथ मिल्खा सिंह से मिलना चाहता था।” स्मरणीय है कि ‘उड़न सिक्ख’ मिल्खा सिंह के १८ जून, २०२१ ई० को निधन के बाद नीरज का स्वप्न साकार हो गया है। मिल्खा सिंह की अन्तिम इच्छा थी– कोई भारतीय फ़ील्ड और ट्रैक (एथलेटिक) पर स्वर्णपदक जीते। अब वे मेरी उपलब्धि को स्वर्ग से देख रहे होंगे।” नीरज एक ऐसे यशमान् पथ पर चल पड़े हैं, जिस पर भालाप्रक्षेपण का कोई भी भारतीय खिलाड़ी पिछले सौ वर्षों में चलने में समर्थ न हो सका था। ‘ट्रैक ऐण्ड फ़ील्ड’ प्रतिस्पर्द्धाएँ यानी एथलेटिक्स ओलिम्पिक-खेलों के मुख्य आकर्षण होती हैं। सर्वाधिक महत्त्व का विषय है कि नीरज चोपड़ा से पूर्व कोई भी भारतीय इन प्रतिस्पर्द्धाओं में पदक नहीं जीत पाया था। ब्रिटिश इण्डिया की ओर से खेलते हुए, नॉर्मन प्रीटचार्ड ने वर्ष १९०० में आयोजित ओलिम्पिक में एथलेटिक्स में दो पदक अर्जित किये थे; परन्तु वे अँगरेज़ थे, ‘भारतीय’ नहीं। प्रतियोगिता के पहले चक्र में १२ खिलाड़ियों में से ८ ने अगले दूसरे और अन्तिम चक्र में स्थान बनाये थे। उस दौरान नीरज ने एक से अधिक ‘अमान्य (फ़ाउल) प्रदर्शन’ किये थे; परन्तु उनके लिए बेहतर स्थिति यह रही कि वे ‘आरम्भ से अन्त’ तक शीर्ष पर ही बने रहे। उल्लेखनीय बात रही कि नीरज चोपड़ा के भाले की दूरी के आस-पास भी किसी प्रतियोगी के भाले की नोक धँसी नज़र नहीं आ रही थी। इस प्रतियोगिता में ८६.०७ मीटर की दूरी तक भाला फेंककर चेक गणराज्य के खिलाड़ी जैकब वैदलेक ने रजतपदक और उनके ही देश के वितेजस्लेव वेसली ने ८५.४४ मीटर की दूरी तक भाला फेंककर काँस्यपदक जीते थे। नीरज के भाले ने अपने पहले ही प्रयास में ८७.०३ मीटर की दूरी; दूसरे में ८७.५८ मीटर तथा तीसरे प्रयास में ७६.७९ मीटर की दूरी तय की थी। वे चौथे और पाँचवें प्रयास में ‘अमान्य (फ़ाउल) प्रक्षेपण’ के बाद छठे प्रयास में ८४.२४ मीटर की दूरी तक भालाप्रक्षेपण कर, भारत के मस्तक को स्वर्णमुकुट से आभूषित करने का आधार तैयार कर लिया था; अन्तत:, उनके द्वारा भाले से दूसरे प्रयास में ८७.५८ की दूरी को मापने को सफलता का मापदण्ड ठहराया गया था। नीरज चोपड़ा का प्रदर्शन ऐतिहासिक रूप ले चुका है। वे ओलिम्पिक में भालाप्रक्षेपण की व्यक्तिगत स्पर्द्धा में स्वर्णपदक अर्जित करनेवाले ‘प्रथम भारतीय’ बन चुके हैं और एक एथलीट के रूप में द्वितीय। उनसे पहले अभिनव बिन्द्रा लगभग १३ वर्ष पहले, १२ अगस्त, २००८ ई० को ‘बीजिंग-ओलिम्पिक’ में निशानेबाज़ी-प्रतियोगिता के अन्तर्गत १० मीटर एअर रायफल-स्पर्द्धा (निशानेबाज़ी) में भारत के लिए स्वर्णपदक पर अचूक निशाना लगाकर प्रथम व्यक्तिगत स्वर्णपदक-विजेता भारतीय खिलाड़ी बने थे।

अब जहाँ तक नीरज चोपड़ा की पारिवारिक पृष्ठभूमि की बात है तो उनका परिवार अत्यन्त अभावों में रहा है। नीरज की स्थिति यह थी कि उनके पास भाला ख़रीदने के लिए रुपये तक नहीं थे। वे पानीपत (हरियाणा) के ‘खण्डरा गाँव’ के निवासी हैं। वे एक राजपूत किसान के बेटे हैं। वे ‘ट्रैक और फ़ील्ड प्रतिस्पर्द्धा’ के अन्तर्गत भालाप्रक्षेपण करनेवाले खिलाड़ी हैं।

वर्ष २०१६ के दक्षिण-एशियाई खेलों में नीरज चोपड़ा ने भालाप्रक्षेपण में भारतीय राष्ट्रीय कीर्तिमान् ८२.२३ मीटर की दूरी की बराबरी कर, अपनी आकर्षक क्षमता का परिचय दिया था। वर्ष २०१६ के ओलिम्पिक में वे अपना प्रदर्शन करने से वंचित रह गये थे; क्योंकि वर्ष २०१६ में उन्होंने जो ‘जूनियर वर्ल्ड कीर्तिमान् स्थापित किया था, वह २३ जुलाई के बाद का था, जबकि ‘रियो-ओलिम्पिक’ के लिए अर्हता-प्रतियोगिता की अन्तिम तिथि २३ जुलाई थी। उन्होंने ८५.२३ मीटर तक भालाप्रक्षेपण कर, वर्ष २०१७ के ‘एशियाई एथलेटिक्स चैम्पियनशिप’ में स्वर्णपदक अर्जित किया था। इतना ही नहीं, नीरज ने वर्ष २०१८ में गोल्ड कोस्ट (ऑस्ट्रेलिया) में ८६.४७ मीटर की दूरी तक भालाप्रक्षेपण कर, स्वर्णपदक पर अधिकार कर लिया था।

अब वर्ष २०२० के टोक्यो-ओलिम्पिक में भारत के लिए एकमात्र स्वर्णपदक-विजेता नीरज चोपड़ा के प्रदर्शन से देश का आबाल वृद्ध अत्यन्त भावुक और गौरवान्वित हो चुका है। नीरज को देश के अनेक राज्यों की सरकारों की ओर से रुपये और सुविधा-साधन-पद, सम्मान-पुरस्कार आदिक के निमन्त्रण दिये जाने लगे हैं; क्योंकि वैसा करके सरकारें स्वयं को धन्य होता अनुभव करेंगी।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ७ अगस्त, २०२१ ईसवी।)