● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
‘न्यू इण्डिया की मोदी-सरकार’ मे वित्तमन्त्री के रूप मे जनता के सीने पर हल जोत रही निर्मल सीतारमण से कल (२५ जुलाई) लोकसभा मे जब प्रश्न किया गया था– स्विस बैंकों मे कितने भारतीयों के काले धन हैं? तब उसने उत्तर दिया– सरकार को नहीं मालूम।
फिर नरेन्द्र मोदी ‘नोटबन्दी’ कराकर विदेश से काला धन लाने की बात किस आधार पर कर रहे थे?
अरे! तुम सभी को बार-बार धिक्कार है, जो वर्ष २०१४ से देशवासियों की पीठ मे खंजर भोंकते आ रहे हो। सच तो यह है कि किसी लोकतान्त्रिक देश का संचालन कैसे किया जाता है, ‘न्यू इण्डिया की मोदी-सरकार’ को बिलकुल नहीं समझ। समझ है तो यही कि देश की जनता को तथाकथित ‘धर्म’ के नाम पर किस तरह से उल्लू बनाकर सत्ता हथियाये रखा जाये; देशवासियों की आय के सारे स्रोत छीन लिये जायें; महँगाई से देश की जनता, विशेषकर मध्यम वर्ग की ज़िन्दगी बेहाल कर दी जाये।
प्रधान चौकीदार, फ़क़ीर आदिक के नाम पर ‘मोदी ऐण्ड कम्पनी’ ठीक उसी तरह से हम देववासियों पर अत्याचार करती आ रही है जिस तरह से ‘व्यवसायी’ और ‘व्यापारी’ के नाम पर ब्रिटिश लोग आकर हम पर शासन करने लगे थे और अपने कलुषित-कुत्सित तथा कदाचारी चरित्र का परिचय देने लगे थे।
इस देश मे इस कथित सरकार ने हिन्दू, भगवा, गाय, गोबर, जय सिरी राम, नमाज़, हनुमान चालीसा, बुलडोज़र आदिक के नाम पर, उनकी आड़ मे जिस तरह का आतंकी वातावरण बना दिया है, उससे देशवासियों की प्रगति की राह पूरी तरह से अवरुद्ध हो चुकी है।
ऐसे सभी नेताओं को ज़रा भी लज्जा नहीं आती कि स्वयं तो सभी प्रकार के अवैध-वैध सरकारी सुविधाओं, साधनो तथा अधिकारों का लाभ तो लेते आ रहे हैं और जनसामान्य को उनके मौलिक अधिकारों से भी वंचित रखते आ रहे हैं। ऐसे लोग शासन करने के योग्य हैं ही नहीं।
‘मोदी ऐण्ड कम्पनी’ मे तीन से चार तक लोग का एक ऐसा गुट है, जो मनमाना निर्णय करता आ रहा है और अपने ही मन्त्रिपरिषद् के शेष चेहरों को दरकिनार किये हुए है। उन उपेक्षित लोग मे से किसी का भी चरित्र इतना उन्नत नहीं है, जो बग़ावत पर उतरकर ढहते लोकतान्त्रिक मूल्यों की रक्षा कर सके। यही कारण है कि कथित सरकार मे शामिल चेहरे सजीव रहते हुए भी ‘निर्जीव-से’ दिखते आ रहे हैं।
इस कथित सरकार को देश की न्यायपालिका ने कई अवसरों पर इतना धिक्कारा है कि यदि भावना-संवेदना जीवितावस्था मे रहतीं तो मुखिया एक फ़क़ीर की तरह से झोला उठाकर चल पड़ता; परन्तु सत्तासुख मे “नख-शिख” डूबा व्यक्ति हर धिक्कार को माथे से लगाकर निर्लज्जता की पराकाष्ठा का भी अतिक्रमण करता रहे तो उसके लिए क्या कहा जाये, शब्द भी निश्शब्द-से दिखते हैं।
सबसे अधिक आश्चर्य की बात यह है कि ‘मुक्त मीडिया’ (सोसल मीडिया) के साथ जुड़े बड़ी संख्या मे अराजक तत्त्वों का एक ऐसा ‘गैंग’ है, जो समाज मे कथित ‘हिन्दू-धर्म’ का अफ़ीम बाँट रहे हैं, जिनमे से अधिकतर बेरोज़गार हैं; परन्तु कथित धर्म का चरस इस क़द्र सिर चढ़कर बोलता है कि वे मरने-मारने पर उतारू दिखते हैं; किसी की स्वस्थ टिप्पणी पर अभद्र प्रतिक्रिया करते हुए, टिप्पणीकर्त्ता को उकसाते रहते हैं। मुसलमानो मे भी बड़ी संख्या मे ऐसे शातिर नमाज़ी लोग हैं, जो धर्मान्ध होकर समाज मे “अल्लाहू अकबर” का हुंकार भरते हुए, वातावरण को यों आन्दोलित कर देते हैं, मानो शान्त सरोबर के जल मे ढेला फेंकर कोई उसकी निश्चिन्तता की अवस्था को चिन्तामयी बना देता हो। दोनो समुदायों को मनबढ़ बनाने का काम उनके प्रमुख मुखिया करते आ रहे हैं। ख़ुद तो वाई, वाई प्लस, ज़ेड तथा ज़ेड प्लस की सुविधाएँ लेकर बंकर मे छिपे रहते हैं; जनता के प्रमुख मुखिया के रूप मे एक डरपोक के रूप मे तरह-तरह की सुरक्षा के घेरे मे चलते हैं और स्वयं को लोकतन्त्र का झण्डाबरदार बताते हैं। सच तो यह है कि ऐसे लोग ‘अधिनायकतन्त्र’ (तानाशाही) के पोषक होते हैं।
ऐसे लोग अपनी ही रक्षा कर लें, बहुत है; लोकतन्त्र तो अपने ही हाल मे आज़ादी के बाद से अब तक जीता आ रहा है।
बहरहाल, आज देश का स्वत्व संकट मे है; सरकार के सभी अंग ‘दिव्यांग-रूप’ मे दिख रहे हैं। देश का बँटवारा अघोषित रूप मे किया जा चुका है :– एक हमारा और दूजा उनका।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २६ जुलाई, २०२२ ईसवी।)