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किसी भी पंचमाक्षर पर अनुस्वार का प्रयोग नहीं होता– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

लातूर (महाराष्ट्र) मे आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की हिन्दी-पाठशाला

राजर्षि शाहू महाविद्यालय, लातूर (महाराष्ट्र) के हिन्दी-विभाग की ओर से राष्ट्रीय स्तर पर प्रयागराज की ‘आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की हिन्दी-पाठशाला’ के अन्तर्गत ‘उच्चारण और लेखन-स्तर पर अशुद्धियाँ’ विषयक द्विदिवसीय कर्मशाला का आयोजन महाविद्यालय-सभागार मे किया गया।

समारोह के अध्यक्ष शिव छत्रपति शिक्षण-संस्था, लातूर के अध्यक्ष डॉ० गोपाल राव पाटिल ने कहा, “हिन्दी-भाषा पक्की करने के लिए संस्कृत की जानकारी ज़रूरी हो जाती है। हिन्दी-भाषा बोलते समय मराठी भाषा के कुछ शब्द आते हैं तो आने दीजिए। आप धीरे-धीरे शुद्ध लिखना और बोलना सीख जायेंगे।”

मुख्य अतिथि भाषाविज्ञानी एवं समीक्षक आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने कहा, “हम हिन्दी पर गर्व करते हैं; परन्तु जब उसके शुद्ध स्वरूप पर विचार करने का विषय सामने आता है तब हम अपने दायित्वबोध से पीछे हटने लगते हैं। यही कारण है कि शिक्षण-संस्थानो मे प्राय: प्रत्येक विषय की गिरती स्थिति पर चिन्ता की जाती है; परन्तु शुद्ध हिन्दी-भाषा के प्रति सजगता नहीं दिखती। ऐसे मे हमे मौखिक और लिखित स्तर पर शुद्ध हिन्दीशब्द-व्यवहार के प्रति शिक्षित समाज को जागरूक करना होगा।”

आरम्भ मे समारोह के मुख्य अतिथि आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने दीप-प्रज्वलन कर समारोह का उद्घाटन किया।

इसी अवसर पर अध्यक्ष डॉ० गोपाल राव पाटिल ने मुख्य अतिथि को अंगवस्त्र आदिक भेंटकर सम्मान किया। मुख्य अतिथि ने हिन्दी-विषय मे सर्वाधिक अंक प्राप्त करनेवाली तथा पाठ्येतर क्रियाकलाप मे उल्लेखनीय उपलब्धियाँ अर्जित करनेवाली छात्र-छात्राओं को पारितोषिक प्रदान किये।

राजर्षि शाहू महाविद्यालय मे हिन्दीविभाग-प्रमुख और संयोजिका डॉ० पल्लवी भूदेव पाटिल ने मुख्य अतिथि के परिचय मे कहा, “आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक ऐसे व्यक्तित्व हैं, जिनके शरीर मे रक्त नहीं बनता, ‘व्याकरण’ बनता है। आप शुद्ध हिन्दी ओढ़ते-बिछाते हैं और अपनी छत्रच्छाया मे शिक्षाजगत् को शुद्ध हिन्दी का आहार कराते रहते हैं।”

उसके पश्चात् आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की लगातार ढाई घण्टे तक अहिन्दीभाषा-भाषी क्षेत्र के उस स्वायत्त महाविद्यालय मे कर्मशाला चलती रही, जिसमे ९८७ विद्यार्थी हिन्दी-विषय के ही हैं, जो कि गौरव का विषय है। आचार्य पाण्डेय ने शब्द-प्रकार, प्रकृति, विस्तार, भाषा-भेद-विभेद, शब्द-रचना, शब्द-विश्लेषण, श्रुत-अश्रुत-विश्रुत शब्दों का सार्थक प्रयोग, प्रयोग-भेद, रूढ़ शब्दप्रयोग-औचित्य-अनौचित्य पर सोदाहरण प्रकाश डाला था।

उन्होंने पंचमाक्षरों मे अनुस्वार का प्रयोग नहीं किया जाता, इसे प्रभावकारी ढंग से समझाया। इसके लिए उन्होंने ‘ङ’, ‘ञ’, ‘वर्णो’ ‘तीनो’ ‘मैने’, ‘हमे’ आदिक मे दिख रहे पंचमाक्षरों को कारण-सहित शुद्ध बताया। उन्होंने ‘विचार करना’, ‘विचार देना’, ‘विचार रखना’, ‘संकल्प लेना’, ‘व्याख्यान देना’, ‘योगदान देना’ आदिक शब्दप्रयोग को पूर्णत: अशुद्ध और अनुपयुक्त बताया और समझाया।
अन्त मे, महाविद्यालय के उप-प्राचार्य डॉ० सदाशिव शिन्दे ने आभार-ज्ञापन किया। संचालन डॉ० सूर्यकान्त चह्वाण और विजय गवली ने किया।