
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
हमारे पास ‘विचार’ है, जो हमारी उष्मा है और ऊर्जा भी; वही हमारा शस्त्र है और शास्त्र भी। हम व्यक्ति-विशेष के समर्थक और विरोधी नहीं हैं, प्रत्युत हम गुण-अवगुण के आधार पर नीतियों और व्यवस्था का मुखर समर्थन और विरोध करते हैं। कोई भी शस्त्रास्त्र हमारे शरीर को नष्ट तो कर सकता है, परन्तु हमारे विचारों को नष्ट करनेवाला शस्त्रास्त्र कहीं नहीं है।
अरे मूढ़ो! शरीर तो ‘घोषित मृतक’ है। ऐसे में, ‘भाषाविद्’ की संज्ञा से आभूषित होनेवाले एक अति निर्भीक पौरुष की हत्या कर, तुम लोग कौन-सी साहसिकता अर्जित कर लोगे?
मेरी हत्या करने-कराने की धमकी-चेतावनी देकर मेरे विचार को कोई दबा नहीं सकता। इससे तो मुझे और ऊर्जा प्राप्त हो चुकी है। मेरी लेखनी किसी की बन्धक नहीं है; विरासत नहीं है, वह तो मुक्त है; उन्मुक्त है; सूर्यधर्मिणी और अग्निधर्मिणी भी।
मेरी लेखनी एकपक्षीय व्यवस्था के विरुद्ध आग उगलती है; क्योंकि मैं वस्तुत: राष्ट्रवादी हूँ। विकृति धार्मिकता और जातिवादिता की राजनीति जब देश को विभाजन की ओर ले जाती है और ऐसे में, तटस्थ प्रबुद्ध-वर्ग अपना समवेत स्वर मुखरित करता है तब सत्ता की चूलें दोलायमान् की स्थिति में आ जाती हैं।
ऐसे में, सहज ही प्रश्न है— कितनो को मारोगे? राष्ट्रहित में मुझसे भी अधिक मुखर, भास्वर और प्रखर हस्ताक्षर इस देश में हैं, जो सत्ता की जनविरोधी नीतियों को ‘दिव्यांग’ की अवस्था में ले जाने के लिए किसी भी प्रकार की सकारात्मक क्रान्तिकारिता को जन्म देने में समर्थ और क्षम हैं।
राष्ट्रवाद अक्षुण्ण रहे। वन्देमातरम्।