● अन्तर्राष्ट्रीय भाषा संस्थान सूरत, भाषा शिक्षण संस्थान कोलकाता व भाखा पत्रिका के सामूहिक प्रयासों से हुआ कार्यक्रम ।
सीतापुर । अवधी लोकगीत में वह ताकत है जिससे विदेश में रहने वाला भी भारतीय साहित्य से विशेष अनुराग रखता है ।
यह बात अन्तर्राष्ट्रीय अवधी उत्थान समिति अमरीका के अध्यक्ष प्रोफेसर बलराम सिंह ने अवधी लोकगीत से नव गीत तक विषयक संगोष्ठी में बतौर मुख्य अतिथि एक बेबनार कार्यक्रम में कही । उन्होंने भारत में अवधी अकादमी की आवश्यकता को रेखांकित करते हुए कहा कि इसकी जो उपेक्षा हो रही है वह उचित नहीं है । यह दुख भी प्रकट किया कि जब नेपाली हमारी आठवीं अनुसूची में हो सकती है तो अवधी क्यों नहीं ? मारीशस के निवासी राज हीरामन ने विशिष्ट अतिथि के रूप में कहा कि अवधी भाषा में रची गई रामचरित मानस को लोग हमारे यहाँ बड़े चाव से पढ़ते हैं । यह ग्रंथ हमारे देश की भी सांस्कृतिक धरोहर है । चीन से आशीष गोरे ने कहा कि प्रान्तीय भाषाओं में लिखे गये लोकगीत और नव गीत हृदय को स्पर्श कर लेते हैं । छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के पूर्व अध्यक्ष डॉ विनय कुमार पाठक ने छत्तीसगढ़ी और अवधी के अंतरंग संबंधों पर न केवल व्यापक प्रकाश डाला अपितु इन दोनों भाषाओं के भावी रिश्तों को सुदृढ़ बनाए रखने के लिए बहुत महत्वपूर्ण सुझाव भी दिये ।
डॉ प्रकाश चंद्र गिरि ने वंशीधर शुक्ल के अवदान को उद्धृत करते हुए बताया कि जो काम कहानी और उपन्यास के क्षेत्र में प्रेमचंद कर रहे थे वही काम अवधी कविता के क्षेत्र में वंशीधर शुक्ल ने किया । प्रोफेसर देवेन्द्र चौबे ने 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम में अवध अंचल के महत्वपूर्ण योगदान को यह कहते हुए विशिष्ट और ऐतिहासिक बताया कि सीतापुर जिले के एक लेखक के द्वारा उनका प्रामाणिक विवरण इनके ग्रंथ में उद्धृत किया गया है, जिन सेनानियों को पेड़ों पर लटकाया गया था। स्वतंत्रता सेनानियों का यह अवदान अनुल्लिखित ही रह जाता यदि इन लेखक महोदय के द्वारा इनका जिक्र न किया जाता । उन्होंने यह भी कहा कि ‘भाखा’ पत्रिका के बैनर तले संपन्न होने वाले इस आयोजन में देश विदेश की जिन हस्तियों ने हिस्सा लिया वह अवध और अवधी दोनों के लिए शुभ संकेत है। अवधी के वरिष्ठ नवगीतकार चंद्रप्रकाश पांडे ने देश और समाज की विसंगतियों को अपने लोकगीत के माध्यम से व्यक्त किया । कवि भगवती प्रसाद और अरुण वर्मा गवाँर ने अपने सुमधुर काव्य पाठ से आयोजन को सरस और सम्मोहक बनाया ।
कार्यक्रम का शुभारंभ लोकगायिका डॉ अमिता चौधरी के द्वारा देवी वन्दना प्रारम्भ किया गया । कार्यक्रम के मुख्य संयोजक और भाखा के प्रधान संपादक डॉ गंगा प्रसाद शर्मा ने अपने स्वागत उद्बोधन में सभी का अभिनन्दन करते हुए कहा कि बाबा तुलसीदास के पद आज के कोराना काल में ज्यादा प्रासांगिक है जैसे खेती न किसान को/भिखारी को न भीख बलि/बनिक बनिज न चाकर चाकारी । जीविका विहीन लोग सीद्यमान सोच बस/कहैं एक-एकन सों कहां जाय का करी। इसके साथ ही उन्होंने अवधी और उसकी सांस्कृतिक विरासत को बचाए रखने की पुरजोर वकालत करते हुए कहा कि अगर हम इस विरासत को न बचा पाए तो हमारी सूफी काव्य परंपरा और बाबा तुलसीदास को समझने के लिए हमारी अगली पीढ़ी के पास न कोई उपकरण होगा और न ही कोई सुविधा । इसके लिए आंदोलन धर्मी प्रयास की जरूरत है ।
अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रोफेसर सूर्य प्रसाद दीक्षित ने भाखा पत्रिका और उसके संपादक मंडल को इस बात की बधाई देते हुए कहा कि संकट काल में भी अवधी को वैश्विक स्वरूप देने की महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। भाषा को वैश्विक बनाने के भाखा पत्रिका के इस प्रयास को ऐतिहासिक बताकर शुभ आशीष दिया । धन्यवाद ज्ञापन भाखा पत्रिका के संपादक विनय कुमार शुक्ल और संचालन पत्रिका के सह संपादक देवेन्द्र कश्यप निडर ने किया।
इसके मौके पर डॉ भारतेन्दु मिश्र, आराध्य शुक्ल, वन्दना तिवारी, डा रश्मि शील, सत्येन्द्र कुमार, डा अरुण कुमार तिवारी, डा जय शंकर तिवारी,निर्मला यादव, अशफाक, डा सत्य प्रिय पाण्डेय सहित अन्य मौजूद रहे ।