जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद
चहुँओर मची है होड़ा – होड़ी,
कहीं गुरुपर्व कहीं पे लोहड़ी!
कहीं बिहू है,है कहीं पे पोंगल,
मैं कहता त्यौहार है खिचड़ी !
कहीं स्नान,तो कहीं होता दान,
हमारी संस्कृति है बड़ी महान!
कहीं पतंग तो कहीं होता दंगल,
त्यौहारों से होता सबका मङ्गल!
धर्म,कर्म और आस्था का मेला,
संगम तीरे का वो रेलम- रेला!
कहीं पे चन्दन, कहीं पे टोपी,
कहीं खिलौने तो कहीं पे पगड़ी!
मैं कहता त्यौहार …………….
सूर्य ने बदला अयन है अपना,
ठण्ढ़ी हो जायेगी अब सपना!
फूलेगी सरसों औ आम्र मञ्जरी,
फलेंगे फ़ल और भरेगी बखरी!
चना फूलकर अब गुप्पा होगा,
अब तो बसंत ही बप्पा होगा!
कहीं शिवरात्रि कहीं पे होली,
तब आएगी बन्धु गर्मी तगड़ी!
मैं कहता त्यौहार…………….