● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
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आसमान मे उड़ते बादल,
रूप बदलकर छाते बादल।
कभी दिखे हैँ-कभी छिपे हैँ,
आँख-मिचौनी खेलेँ बादल।
चेहरे उनके काले-भूरे,
रंग बदलते रहते बादल।
बरखा रानी रिमझिम नाचेँ,
मनहर ताल लगाते बादल।
दाँत दबाती क्रोध से वर्षा,
आज्ञा पाने आते बादल।
पैर पटकतीँ, बिजलीरानी,
गरज-तरज चौँकाते बादल।
संग हवा के दौड़ लगाते,
पार नहीँ पाते हैँ बादल।
ठण्ढक पाकर देह अकड़ती,
गुप-चुप धूप दिखाते बादल।
हाथ किसी के कभी न आते,
दूर गगन छा जाते बादल।
सूरज जब ग़ुस्से मे होता,
दूर छिटक जाते हैँ बादल।
सबके मन को भाते रहते,
प्यारे-न्यारे कितने बादल!
कवि-कल्पना अनुपम होती,
तरह-तरह दिख जाते बादल।
कभी हैँ दानव, कभी देव हैँ,
कभी परी-सी उड़ते बादल।
कभी हैँ बच्चा, बूढ़े दिखते,
कभी पशु हैँ बनते बादल।
कभी पहाड़-पर्वत-से दिखते,
कभी क्षितिज बन जाते बादल।
करो कल्पना जैसी तुम भी,
वैसा रूप दिखेँगे बादल।
रूई के फाहे-से दिखते,
छँट जाते पलभर मे बादल।
वह दिन कब आयेगा प्यारे!
मन हो जाये बादल-बादल?
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प्रयागराज (उत्तरप्रदेश)।