
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
किसी भी विषय में किसी के साथ ‘लिपिर-लिपिर’ नहीं की जाती है। सहजतापूर्वक जब तक पारस्परिक सहमति बनी रहे तब तक एक-दूसरे के साथ ईमानदारी और निष्ठापूर्वक चलते रहना चाहिए; विपरीत स्थिति में ‘तू अपने घर, मैं अपने घर’ का निर्वहन कर लेना चाहिए।
मान-सम्मान-स्वाभिमान के मूल्य पर किसी भी पद-प्रतिष्ठा, प्रलोभन पर पद-प्रहार कर देना चाहिए। यही आचरण हमारा समादर करने के लिए निर्विकल्प के रूप में बाध्य हो जाता है।
जीवन में ऐसे कर्म करने चाहिए; ऐसे दृष्टान्त और प्रतिमान बन जाने चाहिए कि मनुष्य सार्वकालिक अपरिहार्य सिद्ध होता रहे। बिना किसी दबाव और प्रभाव के जो भी साधन-संसाधन, सुविधादिक मनुष्य के पास उपलब्ध हैं, उनका सर्वोत्तम उपयोग-उपभोग करने का कौशल विकसित करना होगा; क्योंकि आपके अभाव में सत्य यदि हो तो उसी में आपको ‘भाव’ का दर्शन होगा। यही कारण है कि नैतिक अभाव में ही उदात्त प्रभाव संलक्षित होता है और व्यष्टि में ‘समष्टि’ का विग्रह प्रत्यक्ष होता है।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय; २० नवम्बर, २०१८ ई०)