डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)
अद्वैतवाद जब हृदय-प्रान्त में पहुँचकर भावनाओं के अनुकूल हो जाता है तब ‘रहस्यवाद’ की सृष्टि होती है। यह भाव-धारा जब एकनिष्ठ हो जाती है तब भक्ति के ठोस स्वरूप में परिवर्त्तित हो जाती है। इसके लिए यह आवश्यक नहीं कि भक्ति का आलम्बन गोचर ही हो। अगोचर आलम्बन के आश्रय से भी एकनिष्ठता आ जाती है; किन्तु यहाँ से निर्गुण अव्यक्त सत्ता पर कुछ गुणों का आरोपण अवश्य हो जाता है; राग-विराग की प्रवृत्तियों के व्यायाम के लिए कुछ गुणों का आरोपण अनिवार्य है।