नववर्ष में हिन्दीभाषा की शुद्धता के प्रति समाज को हमारे साहित्यकार, अध्यापक तथा पत्रकार-वर्ग जागरूक करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। इसका लक्षण उस समय दिखा जिस समय ‘सर्जनपीठ’, प्रयागराज की ओर से नववर्ष की पूर्व-सन्ध्या पर ३१ दिसम्बर को एक आन्तर्जालिक राष्ट्रीय बौद्धिक परिसंवाद का आयोजन हुआ। इस अवसर पर हमारे प्रबुद्धवर्ग की भाषा के प्रति शुद्धता की चिन्ता सुस्पष्ट रेखांकित होती रही।

तो आइए! आप भी चिन्ता को समझें और अनुभव करें।
★ हमारी व्याकरणात्मक अनुशासन के प्रति आस्था है
● श्री विभूति मिश्र
(प्रधानमन्त्री– हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग)
“हम अपने सम्मेलन के माध्यम से भाषा के शुद्धता के प्रति जागरूक रहते हैं। हम अपने पाक्षिक समाचारपत्र ‘राष्ट्रभाषा सन्देश’ और त्रैमासिक शोध-पत्रिका ‘सम्मेलन पत्रिका’ के माध्यम से उन्हीं सामग्री का प्रकाशन करते हैं, जो व्याकरणात्मक नियमों का पालन करते हुए आलेख प्रेषित करते हैं। भविष्य में हम अपनी शुद्ध हिन्दी-भाषाप्रयोग के प्रति और जागरूकता का परिचय देंगे।”

● श्री रमाशंकर श्रीवास्तव
सम्पादकीय प्रभारी– आज, प्रयागराज)
“हिन्दी-भाषा की व्याप्ति गौरवपूर्ण है; परन्तु शुद्धता के सन्दर्भ में वह आज भी दोषपू्र्ण है। ऐसा इसलिए कि जिन लोग को समाज को शुद्धता के प्रति जागरूक करना चाहिए, वे मौन साधे बैठे हैं। हम अपने समाचारपत्र के माध्यम से यह प्रयास करेंगे कि जो भी शब्द प्रयोग हो, वह शुद्ध और सरल हो।”

★ हम भाषा की शुद्धता के प्रति अपने विद्यार्थियों को सजग करते रहते हैं
● डॉ० घनश्याम भारती
(हिन्दी-विभागाध्यक्ष– शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, सागर (मध्यप्रदेश)
“हम अपने महाविद्यालय-स्तर पर जितनी भी गतिविधियाँ आयोजित करते हैं, विशेषत: हिन्दी-विभाग के आयोजनों में भाषा की शुद्धता के प्रति अपने विद्यार्थियों को जागरूक करते रहते हैं। नये वर्ष में भाषा के शुद्धता-हेतु विद्यार्थियों, शिक्षकों, पत्रकारों तथा हिन्दीप्रेमियों का ध्यान केन्द्रित करना हमारा मूल ध्येय होगा। हम सबको मिलकर हिन्दी के मानकीकरण को जन – जन तक पहुँचाने का सार्थक प्रयास करना होगा। सरकारी और निजी संस्थानों में लाखों विद्यार्थी अध्ययनरत हैं, जिन्हें हिन्दी भाषा की शुद्धता का ज्ञान कराना अपेक्षित है। प्रिंट तथा इलेक्ट्रोनिक मीडिया के माध्यम से जो पत्रकारगण हिन्दी का प्रचार कर रहे हैं, उनके लिए हिन्दी के मानक शब्दों को जानना परमावश्यक है। मैं अपने साहित्य-सर्जन के माध्यम से मीडियाकर्मियों का ध्यान केन्द्रित करूँगा, ताकि जनसामान्य तक हिन्दी का मानक रूप पहुँच सके। शिक्षकों को भी हिन्दी के मानकीकरण को समझना, उनका मूल कर्त्तव्य है। शिक्षकों को हिन्दी के मानकीकरण से परिचित कराना भी इस नये वर्ष में मेरा मुख्य कार्य होगा।”

★ व्याकरण को आधार बनाकर विद्यार्थियों को भाषाज्ञान कराना होगा
● डॉ० नीलम जैन
(शिक्षाविद्-विचारक, पुणे, महाराष्ट्र)
“भाषा हमारे कर्तृत्व का दर्पण है। भाषा का शुद्ध प्रयोग लेखन और वाचन में होना ही चाहिए। व्याकरण , भाषा तथा वर्तनी की शुद्धता के कारण ही भाषा में प्रवाहमयता और प्रांजलता आती है। अस्तु, व्याकरण को आधार मानकर ही हमें शिक्षार्थियों को भाषा का अध्ययन कराना होगा। उन्हें अक्षरों की बनावट, वर्तनी का प्रयोग, प्रचलित उदाहरण, शुद्धता-अशुद्धता से शब्दों के अर्थ में परिवर्त्तन को भलीभाँति समझाना होगा और ऐसे शब्दों और वाक्यों को हम चित्र, ऑडियो, वीडियो, संवाद इत्यादि के माध्यम से समझा सकते हैं। भाषा, विभाषा तथा बोली में कैसा अन्तर होता है, शिक्षार्थियों में इसका भी बोध होना चाहिए, तभी वे शुद्धता और अशुद्धता से परिचित होकर उनमें अन्तर का अनुभव करते हुए, शुद्ध भाषा का प्रयोग कर पायेंगे।”

★ हिन्दी-शुद्धता के लिए हमारा अभियान चलता रहेगा
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(परिसंवाद-आयोजक)
“मेरी व्यक्तिगत रूप से और हमारी संस्था की ओर से आयोजित कार्यक्रमों में शुद्ध भाषा-प्रयोग के प्रति कहीं भी समझौता नहीं किया गया है और न ही करना है; क्योंकि हमारी शिथिलता करोड़ों विद्यार्थियों के लिए घातक सिद्ध हो सकता है। हिन्दीभाषा में बड़ी संख्या में सरल और शुद्ध शब्द हैं, जिनका प्रयोग कर हम अपने विद्यार्थियों और अध्यापकों को शब्दानुशासित कर सकते हैं। मैं नये वर्ष में भाषा की मति-गति-रति को समझते हुए अपने लाखों विद्यार्थियों, अध्यापकों, मीडियाकर्मियों तथा अन्य वर्ग के लोग को अपनी पाठशाला तथा अभियान ‘अपनी भाषा सुधारिए’ से सम्बद्ध करने का प्रयास करूँगा तथा विविध सारस्वत प्रतियोगिताओं के माध्यम से उन्हें शुद्ध भाषा-व्यवहार के प्रति प्रोत्साहित करूँगा।”

★ हिन्दी की शुद्धता के प्रति हम सबका दायित्व है
● श्री रतिभान त्रिपाठी
(राजनीतिक सम्पादक– उत्तरप्रदेश; देशबन्धु समाचारपत्र-समूह)
लेखन करते समय मातृभाषा हिन्दी की शुद्धता उचित शब्द- प्रयोग का दायित्व हम सबका है। शिक्षक, पत्रकार, अधिवक्ता तथा अन्य बौद्धिक वर्गों पर इसकी विशेष ज़िम्मेदारी बनती है। एक पत्रकार के रूप में समाचारों तथा सम्बन्धित अन्य लेखन में मैंने हमेशा कोशिश की है कि भाषा की तरलता बनी रहे; लेकिन व्याकरण भी शुद्ध हो। अपनी लिखी और सम्पादित की गयी ग्यारह पुस्तकों में भी मैं इसी व्याकरणिक अनुशासन के प्रति सजग रहा। मेरी यह भी कोशिश रहती है कि लेखन में यदि किसी अन्य भाषा के शब्द-प्रयोग से पाठकीयता रुचिकर लगती है तो उसे ग्रहण कर लेता हूँ। ऐसा इसलिए कि हमारा लेखन बौद्धिक वर्ग से लेकर जनसाधारण तक के लिए होता है। जो शब्द सबके लिए आसान हों, उन्हें लिखा जाये तो लेखन का स्वीकार्य बढ़ जाता है। हाँ, व्याकरण सही होना चाहिए, जिससे कि कोई भी पाठक हमारे लेखन से भ्रमित न हो। हिन्दी को अधिक सुग्राह्य और व्यापक बनाने के लिए मैं सरल शब्दों के प्रयोग का सदैव पक्षधर रहा हूँ। भाषा में जड़ता उचित नहीं होती। उसमें समावेशी प्रवृत्ति विकसित करना अच्छा ही होता है।
हिन्दी-भाषा का फलक व्यापक हो; उसकी ग्रहणशीलता और बढ़े, इसके लिए मैं निरन्तर प्रतिबद्ध और प्रयत्नशील रहूँगा।”

★ मैं मंचों, बैनर आदि में प्रयुक्त अशुद्ध शब्दों के लिए तुरन्त टोकती हूँ।
● डॉ० संगीता बलवन्त
(साहित्यकार और सदर विधायक– ग़ाज़ीपुर)
“भाषा शुद्धता के प्रति प्रत्येक नागरिक को सजग रहना चाहिए।जागरूक व्यक्ति की पहचान है कि वह अपने सामने किसी अशुद्ध बोलनेवाले व्यक्ति को नम्रतापूर्वक उसका ध्यान आकृष्ट कराते हुए, भाषा-शुद्धता की जानकारी दे। जैसे मंचों पर अक्सर लोग मुझे विधायक की जगह विधायिका सम्बोधित करते हैं तब मैं उसी समय बताती हूँ कि विधायिका नहीं, ‘विधायक’ शब्द होता है; क्योंकि पदनाम कभी स्त्रीलिंग नहीं होता। इसी प्रकार जब कभी बृहद् समारोहों में बैनर आदि में मात्रादि की त्रुटि दिखती है तो आयोजकगण का ध्यान उस त्रुटि की ओर ज़रूर आकर्षित करती हूँ, ताकि वे भविष्य में वैसी ग़लती पुनः न कर सकें। स्वयं शुद्ध लिख और बोलकर तथा दूसरों को शुद्धता की तरफ़ ध्यान आकृष्ट करा कर हम रोज़मर्रा के जीवन में शुद्ध भाषा के प्रति अपना दायित्व निर्वहण कर सकते हैं।”

★ हमें अपने-अपने स्तर से जुटना होगा
● डॉ० कृपाशंकर पाण्डेय
(सहायक आचार्य– संस्कृत-विभाग, मुंगेर, बिहार)
“हिन्दी भारतवर्ष के अधिकांश क्षेत्रों की आम जनभाषा है । प्रायः देखा जाता है कि इसे शुद्ध-शुद्ध लिखने, पढ़ने तथा बोलने में लोग त्रुटियाँ भी करते हैं। हिन्दी के अशुद्धि-संशोधन-हेतु हम लोग अपने-अपने स्तर से प्रयत्न कर सकते हैं। इसके लिए हम यदि अध्यापक हैं तो समय-समय पर अपने विद्यार्थियों के लिए अतिरिक्त कक्षाएँ लेकर उन्हें अक्षर, शब्द, वाक्य, अनुच्छेद आदि की विस्तृत जानकारी दे सकते हैं। हम उन्हें बता सकते हैं कि कहाँ पर किन विरामचिह्नों का प्रयोग किया जाना चाहिए ।अनेकशः ऐसा भी देखा जाता है कि लोग लिखते तो शुद्ध हैं; परन्तु उच्चारण अशुद्ध करते हैं। ऐसी स्थिति में हमें स्वयं शुद्ध उच्चारण करके उन्हें उनकी उच्चारण- सम्बन्धी त्रुटि का बोध कराना चाहिए। हम यदि साहित्यकार अथवा पत्रकार हैं तो हमारा यह अतिरिक्त दायित्व है कि हम पूर्ण शुद्ध लेखन करें; क्योंकि हमारे आलेख को हज़ारों लोग पढ़कर प्रेरित होते हैं। हिन्दी-भाषा में त्रुटिसुधार का यह कार्य हम स्वयं से प्रारम्भ करें, फिर अपने परिवार, मित्र तथा छात्रों को भी इसके लिए प्रेरित करें। इस तरह से हम हिन्दी के शुद्ध प्रयोगों को बढ़ावा दे सकते हैं।”

★ शुद्ध लेखन के प्रति विद्यार्थियों को जागरूक करना होगा
● सुश्री शकुन्तला चौहान
(सहायक आचार्य– हिन्दी-विभाग, आई० बी० परा-स्नातक महाविद्यालय, पानीपत, हरियाणा)
“विद्यार्थियों को हिन्दी-भाषा के प्रति जागरूक करने के लिए ध्वनिरूपों और शब्दों के शुद्ध उच्चारण के द्वारा हिन्दी-भाषा की शुद्धता पर ध्यान केन्द्रित करना होगा। वर्ण और शब्द पढ़ने की क्षमता का विकास करके भी विद्यार्थियों में हिन्दी-भाषा की शुद्धता के प्रति जागरूक किया जा सकता है। वर्णों-शब्दों को उचित आकार और उचित क्रम में लिखने के प्रति जागरूक करके, विराम चिह्नों का उपयुक्त प्रयोग करके उनमें लेखन करने की क्षमता जाग्रत् की जा सकती है। व्याकरण का शुद्ध प्रयोग करते हुए शुद्ध उच्चारण,अध्ययन तथा शुद्ध लेखन के द्वारा विद्यार्थियों को हिन्दी-भाषा की शुद्धता के प्रति जागरूक किया जा सकता है।”

★ बालमन में हिन्दी के प्रति रुचि जगानी होगी
● श्री आदित्य त्रिपाठी
(अध्यापक और पत्रकार, हरदोई)
“हिन्दीभाषा की शुद्धता के प्रति प्राथमिक स्तर की कक्षाओं के विद्यार्थीवृन्द को जागरूक करना पहला काम है । जब तक पौधा कमज़ोर है तब तक उन्नत वृक्ष की कामना व्यर्थ है । एक शिक्षक के नाते मेरा यह प्रयास रहेगा कि कॉन्वेण्ट शिक्षा के आधुनिक काल में बालमन में हिन्दी के प्रति सम्मान का भाव पैदा करूँ और हिन्दी के भाषा-सौष्ठव से उन्हें परिचित कराऊँ ।”

★ हिन्दी-भाषा की शुद्धि के लिए भाषाशुद्धीकरण-अभियान चलाने की आवश्यकता है
● श्री राघवेन्द्र कुमार ‘राघव’
(पत्रकार, हरदोई)
“हिन्दीभाषा का प्रादुर्भाव संस्कृत के गर्भ से हुआ है और यह फ़ारसी-अरबी के आँगन में पली-बढ़ी है । हिन्दीभाषा की शुद्धता की कल्पना संस्कृतज्ञान के अभाव में बेकार है । पहला काम यही है कि हम संस्कृतभाषा के आधारभूत सिद्धान्तों और व्याकरण को जानें । अपने साथ काम रहे सहकर्मियों, सहयोगियों तथा परिचितों को इस विषय में जागरूक करें; हिन्दीशब्दों के अशुद्ध उच्चारण और लेखन करनेवालों को टोकें । इस तरह हिन्दीभाषा की शुद्धता के लिए भाषाशुद्धीकरण का अभियान चलायें । हम जहाँ भी कार्य करते हैं, प्रयास करें कि हिन्दीभाषा के शब्द शुद्ध बोले और लिखे जायें । हिन्दीभाषा की शुद्धता हमारे लिए आवश्यक न होकर, दायित्व बन जाये ।

★ हिन्दी-भाषा में शुद्धतापूर्वक कार्य करना होगा।
★ श्री दीपक कुमार यादव
( सहायक अध्यापक– प्राथमिक विद्यालय, मासाडीह, महसी, बहराइच)
हिन्दी-भाषा के शुद्ध उच्चारण पर और संस्थाओं में हिन्दी-भाषा में कार्य किये जाने पर बल देना होगा। शिक्षण के दौरान मात्रिक त्रुटियों पर ध्यान केन्द्रित करना होगा। वार्त्तालाप के दौरान सही शब्द का चयन करना होगा। विद्यालय में बच्चों को सही शब्दों का ज्ञान प्रदान करना होगा।जनसामान्य को भाषा के प्रति जागरूक करना होगा। किसी प्रशिक्षण-कार्यक्रम में सही शब्दों के प्रयोग के संदर्भ में चर्चा- परिचर्चा करनी होगी। हिन्दी-भाषा की उपयोगिता और महत्ता पर प्रबुद्ध-वर्ग के साथ संवाद करना होगा।”
टिप्पणी : यह कार्यक्रम कुछ वर्ष पूर्व का है किन्तु आज भी उतना ही प्रासंगिक जितना आयोजन के समय था।