अब बहुत सो चुके….

● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

जीभर आँखें खोलो!
देखो इन नामर्द दरवाज़ों को;
सिटकिनियों के इशारे पर नाचते आ रहे हैं।
भीतर का माहौल
अघोषित आपातकालीन इन्तज़ामात१ के हवाले है।
हवा बेचैन है;
दरवाज़े को पैरों से खुरेदती है;
दिमाग़दार दोनो पल्लों के दरमियान२
सूराख़ आँखें मीचते दिखते हैं।
धूप अँगड़ाई लेते-लेते सो जाती है।
चहलक़दमी की आहट कानो को चिढ़ाती है;
सख़्त मिजाज़ी पहरा मौन है;
बेआवाज़ साज़३ नासाज़४ है।
मज़्बूत करो हथेलियों को;
सख़्त बना लो, एड़ियों को।
जब तुम दहलीज़५ के पास पहुँचोगे,
तुम्हारे क़दमो की बेख़ौफ़ आहट,
दरवाज़ों के सीने पर
हथौड़े की चोट-सी महसूस करायेंगी;
ख़ुद-ब-ख़ुद पल्ले धड़कते नज़र आयेंगे।
भीतर की चुगुलख़ोरी,
नाज़ाइज६ औलाद की तरह सन्न मार जायेंगी।
तुम्हारे तमतमाते चेहरे से ताक़त पाते,
भींचते हाथ जब उसके गालों पर पड़ेंगे;
सारे राज़ प्याज के छिलके-मानिन्द,
पर्दाफ़ाश होते दिखेंगे।
उठो! दिखाओ हथेलियों के ज़ोर और एड़ियों की ताक़त को;
नेस्तोनाबूद७ करते हुए,
दस्तख़त कर दो,
हर नापाक मंशा के सीने पर।

शब्दार्थ :–

१अरबी-भाषा के शब्द ‘इन्तिज़ाम’ का बहुवचन; व्यवस्था (हिन्दी मे ‘व्यवस्था’ स्वयं मे बहुवचन का शब्द है।) २फ़ारसी-भाषा; बीच ३आवाज़ ४प्रतिकूल ५फ़ारसी-भाषा का शब्द; डेहरी ६अरबी-भाषा का शब्द; अनुचित (जायज़-नाजायज़ शब्द अशुद्ध हैं।) ७फ़ारसी-भाषा का शब्द; विध्वस्त (‘नेस्तनाबूद’ अशुद्ध शब्द है।)

सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २२ दिसम्बर, २०२२ ईसवी।)