कोथावाँ प्रा०वि० का हाल, बच्चों को दूध और फल नहीं दे रहे जिम्मेदार

बहकावे से दूर रह, तर्पण कर दो नाम

January 12, 2022 0

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–लँगोटी हैं चाट रहे, ले-ले गांधी-नाम।पाँच साल के मोह मे, बन जाये कुछ काम।।दो–शासन आते हाथ मे, फिर गांधी-अपमान।अन्तिम निर्णय कर बढ़ो, रहे न कोई नाम।।तीन–बहकावे से दूर रह, तर्पण […]

कुत्तों की ‘जातीय’ पहचान

December 28, 2021 0

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय देखो!थोड़ा नज़दीक आओ।देखो! उस कुत्ते कोअपनी जाति पहचानता है।उसके सामने भीड़ हैगँवार कुत्ते से लेकरअर्द्धशिक्षित-शिक्षित कुत्तों की मण्डलीमन्त्रणा करती आ रही है,‘रिफ़ाइण्ड हड्डी’ का दरकार है;क्योंकि उनकी भी अपनी सरकार […]

विषाक्त उत्सवधर्मिता!

November 6, 2021 0

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय दीपवर्तिका की ज्वलनशीलतालोकमानस की सहनशीलतापृथक्-पृथक् पथ पर परिलक्षित होती हैं।दो समानान्तर दूरी पर चलते हुए भीसंवाद करने के लिएकहीं-कोई ठौर नहीं बचता।किस-हेतु लोक दीप जलाता हैख़ुश हो लेता है?दीप-प्रज्वलन के […]

शिक्षक : ‘वेतन भोगी सोच’ है, शिक्षक-सुचिता व्यर्थ

September 6, 2021 0

ऐसी दुर्गति शिक्षकी, चिन्तन,चिन्ता माथ ।बरसों से है घिस रही, झाड़ू अपने हाथ ।। ‘वेतन भोगी सोच’ है, शिक्षक-सुचिता व्यर्थ ।शिक्षणेत्तर बोझ ने, कर दिया बेड़ा गर्क ।। दौड़ा-दौड़ा फिर रहा, निपटाऊ हर वर्क।हाय शिक्षकी […]

“डंके की चोट पर”!

August 31, 2021 0

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज एक–हमारी फ़क़ीरी तुझसे बहुत जुदा है प्यारे!ख़ुद को फ़क़ीर बना, पाप का महल बनाता?दो–ग़रीब की कुटिया ग़र उजाड़ेगा, जल जायेगा बद्दुआ से उसकी।तेरे सिरहाने-पैताने किराये के लोग रोनेवाले होंगे।तीन–अपने हक़ […]

अभिव्यक्ति के दंश

August 31, 2021 0

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–कृष्ण-कृष्ण हैं रट रहे, कर्महीन जो लोग।पापकर्म में रत रहे, मौन दिखे संयोग!दो–अनाचार है पक रहा, कदाचार के धाम।पापी छक्-छक् चूसते, मानो फल हो आम।।तीन–धरा-धाम में दिख रहे, बढ़कर एक […]

‘ओबीसी’ की आड़ में, बँटने लगा समाज

August 9, 2021 0

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय बीज घृणा का हर तरफ़, उगने लगी खटास।गदहपचीसी हर जगह, दूर हो रही आस।।गोरखधन्धा दिख रहा, खेल निराले खेल।बाहर से दुश्मन लगें, अन्दर-अन्दर मेल।।गुण्डों का अब राज है, उस पर […]

इंसानियत को खा गयी है, भूख आपकी

May 23, 2021 0

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय घड़ियाली आँसू, न अब बहाइए हुजूर!मन में हमारे क्या है, अब सुनाइए हुजूर!बातें मन की सुनाते हुए, सुला दिये हमें,चेहरा-पे चेहरा, अब न लगाइए हुजूर!तिकड़मी चाल आपकी, सब जान चुके […]

व्यंग्य : नेताओं का बोलबाला

February 5, 2021 0

प्रांशुल त्रिपाठी, सतना, हिनौती, मध्य प्रदेश संसद भवन में आजनेताओं का बोलबाला चल रहा है ।अब हमारे देश में सिंधिया जैसेनेताओं का जन्म हो रहा है । कोई खुद को बेच रहा हैतो कोई किसी […]

आया अब गणतन्त्र है, करो दिखावा आज

January 26, 2021 0

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–तन्त्र तैरता सिन्धु में, दिखे रेत-सा लोक।खद्दर कलुषित हो गया, जनगणमन में शोक।।दो–बाबा मोदी! उठ रही, हर घर से है आह।चाँदी चाचा शाह की, मुट्ठी में है वाह।।तीन–संविधान है जेब […]

आज की सरकार पर लिखूं, कि हो रहे बलात्कार पर लिखूं

January 17, 2021 0

प्रान्शुल त्रिपाठी : लिखूं तो क्या लिखूंमातृभूमि के मान पर लिखूंकि स्वदेश के सम्मान पर लिखूंभारत के संविधान पर लिखूंकी विधि के विधान पर लिखूंलिखूं तो क्या लिखूं …… शहीदों की कुर्बानी पर लिखूंकि बापू […]

ऐसा मूरख देखिये, बेंचै सूखी घास

November 30, 2020 0

ऐसा मूरख देखिये, बेंचै सूखी घास ।कौन खरीदेगा भला, जिसमें तत्व न आस ।।घूमता गली- गली ।पूछता गली- गली ।। दोनो पलड़ों में धरे, मूरख बेंचै घास ।दून-दून दे डालता,होता नहीं उदास ।।बाँट से क्या […]

अब रऊआँ सभे सुनीं; नीमन लागी नू, तबे रँऊवा सभे थपरी बजाइब

November 7, 2020 0

एगो भोजपुरी ह ० आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय जे-जे रहे दोस्त, सभ दुसमन होइ गइले,हमारा रहतिया में, सभ काँटा बोइ गइले।खूबे हँसी आवेला, ‘बाबू’ के चल्हकिया पर;जे सुरुज के गोलवा, चनरमा समुझि गइले।डूबत खूब देख […]

तानाशाही चरम पर, नहीं कोई दरकार

October 12, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–गयी हाथ से नौकरी, लोग हुए बेकाम।नमो-नमो का जप करो, बोलो जयश्रीराम।।दो–शर्म-हया सब पी गये, छान पकौड़ा तेल।जनता जाये भाँड़ में, अजब-ग़ज़ब का खेल।।तीन–थपरी मारो प्रेम से, उत्तम बना प्रदेश।गुण्डे […]

योगी! तेरे राज्य में जनता है मज़बूर

October 6, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय अन्धकार है छा गया, शासक है बेहोश।पनही लगाओ मुँह पर, आये शायद होश।।जनता भी कुछ कम नहीं, चाटे शहद लगाय।‘हिन्दू’ ‘मन्दिर’ जाप कर, स्वर्ग सहज ही पाय।।पानी-बिजली दूर अब, सब […]

योगी! तेरे शासन में

October 6, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय न बिजली है न पानी,योगी का नहीं सानी।जनघाती नीति कहती–शासन है दुरभिमानी।आँखें खोलो, जागो भी,नहीं यहाँ है दाना-पानी।शासन नहीं, दुश्शासन है,आँख हो गयी है कानी।तन लोभी, मन भी लोभी,याद कराये […]

सबके-सब धुत्त दिख रहे इस मैख़ाने में!

September 24, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–सियासत लिपटी बदनामी की चादर में,सबके-सब धुत्त दिख रहे इस मैख़ाने में!दो–अजीब-सा सन्नाटा पसरा इधर और उधर,आग बो डालो अब, कहीं बीत न जाये पहर।तीन–बात आते-आते नज़र में ठहर आती […]

बोल ए नेता जी! (पहिलका भाग)

July 8, 2020 0

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय हमार देसवा के बेचि-बाचि, खा गइल ए नेता जी!असल आपन रूपवा, देखाइ गइल ए नेता जी!बाड़ा भरोसिया कई के, तहरा के जितइनी हम,आपन दाँव-पेंचवा, देखाइ गइल तू ए नेता जी!बेसरम […]

हूँ तो मैं भी पत्रकार पर, ऐसा जिस पर क़लम लजाती

May 30, 2020 0

राघवेन्द्र कुमार त्रिपाठी ‘राघव’ – डरता नहीं, न ही झुकता हूँ ।जो मन आए करता हूँ ।कहने को तो क़लमकार हूँपर सच कहने से डरता हूँ ।हमने गिरवी क़लम डाल दीसरकारी, दरबारी कोठों पर ।गाँधी […]

नेता जी मुरदाबाद!

May 9, 2020 0

— पृथ्वीनाथ पाण्डेय एक–नेता जी के बग़ल में, सुघर सलोनी सोय।पुण्य कमाते हर घड़ी, पाप कहाँ से होय।।दो–‘नेता’ धाकड़ शब्द है, जपो-जपो हर रोज़।पाप करो हर दिन सदा, करो अनोखा खोज।।तीन–है रूप-रुपया-रुतबा, नेता की पहचान।आग […]

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