— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
भला यह कोई बात हुई, बातों-बातों में रात हुई। हमक़दम बन चलते रहे, मंज़िल के क़रीब घात हुई। मैं खड़ा रह गया दोराहे पे, वे आये और मुलाक़ात हुई। शातिर बिसात बिछाये थे, जाने कब अपनी मात हुई। मंज़िल लड़खड़ाती मिली, यों एक नयी शुरुआत हुई। (सर्वाधिकार सुरक्षित-- आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १ जून, २०२० ईसवी)