अब रची जाती है घर-घर महाभारत;
राजसभाओं से विदुर रहते नदारत।
क्यों कोई द्रुपदात्मजा हरि-पथ निहारे;
अब न रहती है वो पतियों के सहारे।
अब न केवल फनफनाती है;
कोर्ट में नंगा नचाती है।
अब न मीरा भजन गाती है।
लाँघ-देहरी सिसकियों को छोड़ पीछे;
हौंसले से शिथिल करती बाण तीखे।
दैहिक -परीक्षा से नहीं सीता गुज़रती;
आत्मश्लाघा से विरत सम्मान रखती।
अब न केवल बुदबुदाती है
अरि का सीना चीर आती है।
अब न मीरा भजन गाती है।
चूल्हा – चौखट से इतर व्यवहार करती;
मिल रहे अवसर को वो स्वीकार करती।
साँकल की ध्वनि से नहीं डरती-सहमती;
प्रत्यक्ष हो कर सूर्य से संवाद करती।
आज का पुष्पक उड़ाती है;
मेघ से अर्चन कराती है।
अब न मीरा भजन गाती है।
रचनाकार-
जगन्नाथ शुक्ल
(प्रयागराज)