बिनब्याही अपूर्णता

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

तुम्हारी पूर्णता
भाती नहीं मुझे;
क्योंकि तुम मुझसे
द्रुत गति में चलायमान हो।
हाँ, मैं अपूर्ण हूँ।
तुम मुग्ध हो, अपनी पूर्णता पर
और मुझे गर्व है, अपनी अपूर्णता पर;
क्योंकि आज मुझे
एहसास हो रहा है :—
कुछ रिक्तता बहुत ज़रूरी है,
ज़िन्दगी को तराशने के लिए।
मुझे तलाश है :–
एक मधुर और बिनब्याही अपूर्णता की;
जो अनसुनी, अनकही तथा अनदेखी हो;
वही तो मधुर अपूर्णता है
और बिनब्याही मंज़िल भी।
आओ! माँग भर दें;
एक ऐसे अनुराग का प्रस्फुटन कर दें,
जिससे जीवात्मा-परमात्मा का सम्मिलन हो
और हम अपूर्ण रहकर भी
पूर्णता के साक्षी बने रहें।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज, ३० नवम्बर, २०२० ईसवी।)