डॉ. सुधेश (से. नि. हिन्दी प्राध्यापक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय)-
भीतर ज्वर में तन तपता
बाहर कोकिल कूक रही
मीठी वाणी
भीनी भीनी बयार सरकती
कत्थक नर्तकी सी ।
भाई ज्वर जल्दी उतरो
बाहर लाखों का मौसम बिखरा है
देखना उस का भी नख़रा है
इधर मैं तप्त पड़ा हूँ
अपने पापों का दण्ड भोगता
सुनो फिर कोकिल कूकी
क्या बुला रही है मुझ को ?
फिर भीनी बयार का झौंका आया
पूछो क्या कोई सन्देसा हैं ?