एक अभिव्यक्ति : जागर्ति और सुसुप्ति

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय


इलाहाबाद के सघन पदातिक पथ पर
विश्रान्त-क्लान्त शयन करती प्रौढ़ा,
आजीविका-साधन से समन्वय-सामंजस्य स्थापित करती;
अद्भुत एकान्वित और पार्थक्य के आचरण की सभ्यता प्रदर्शित करती;
अवचेतन से साक्षात् करती,
मानो सांसारिकता से सुदूर
किसी निभृत निलय में विराजित स्वप्न-सुन्दरी
श्रेय-प्रेय, योग-क्षेम के बाहुपाश में निबद्ध अपनी स्मिति से
स्वप्नलोक के खण्डित-अखण्डित, आकर्षण-विकर्षण, आवर्त्तन और दरार को
आभूषित कर रही हो।
अभी, सहसा चेतना के धरातल पर पग धरते ही
विचार-उष्मा प्रकट होगी,
मन स्वयं से प्रश्न करेगा।
कदाचित् हथेलियों की लकीरों में प्रश्न अन्तर्हित हो:–
जागर्ति सुसुप्ति से प्रश्न करती हो : तुम मुझसे सुदूर क्यों थी?
आँखों का उपहास करते आजीविका-साधन
अपने अट्टहास को प्रकीर्ण करते
प्रौढ़ा को निराशा-ग्रन्थि से आबद्ध करते।
दु:-सुस्वप्न को टटोलती वह नायिका,
मानो मुट्ठी से सरकती रेत को ‘मृग-मरीचिका’-सदृश
साक्षी दे रही हो।
और दृष्टि-अनुलेपन कर रही हो,
वर्ज्य दीवार के भीतर प्रेक्षित
अप्रत्याशित-कल्पनातीत दृश्य को।
नासिकारन्ध्र उन्मुक्त हों,
स्वप्न-गन्धि के घ्राण के तन्तुओं को स्वयं से आबद्ध करने को।
छायाकार : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; १२ अप्रैल, २०१८ ई०)