होती है तो निन्दा होने दे

● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

सूरज को शर्मिन्दा होने दे,
चाहत को परिन्दा होने दे।
हिम्मत को सजा ले होठों पे,
ज़ालिम को दरिन्दा होने दे।
ज़ुल्फ़ों को झटक दे चेहरे से,
औ' ख़ुद को चुनिन्दा होने दे।
होठों पे हँसी की धूप खिला,
अर्मान को ज़िन्दा होने दे।
सच से समझौता कर न कभी,
होती है तो निन्दा होने दे।
महफ़िल मे हैं उनके लोग बहुत,
अब ख़ुद को छरिन्दा१ होने दे।
मन साफ़ बहुत, बेदाग़ है तू, 
होते हैं गुरिन्दा२ होने दे।

क्लिष्ट शब्दार्थ :– १अकेला/तनहा (‘तन्हा’ अशुद्ध है।) २जासूस।

(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय; ३१ अक्तूबर, २०२२ ईसवी।)