जगन्नाथ शुक्ल (इलाहाबाद)

सिद्धान्तों की शिला पड़ी, निर्वीर्य मनुज धिक्कार रही।
काई लगी पीठिका में , हठ की नागिन बैठी फुफकार रही।
दंश झेलता है समाज , औ नित राष्ट्र बहाता अश्रुधार,
मानव तेरी चञ्चलता से, मानवता बैठी चिग्घार रही।।
सिद्धांतों की शिला…………………….. ………………
धरती अम्बर को बुला रही , सीना चीरे व्याकुल -सी है,
बरसो न तुम छा जाओ ही, सखी तेरी आकुल-सी है।
आर्तनाद चहुँओर मचा, सुनने को कानों में सूजन है,
हर पापी, दम्भी औ चरित्रहीन के चरणों में पूजन है।
आओ कुछ दूर चलो संग में, संघर्षी रीति निभाने को,
क्यों क़दम खींचकर हो बैठे, आतुर हो कील चुभाने को।
लम्पट धूर्तों से व्यथित हुई,धरती फिर आज पुकार रही।
सिद्धांतों की शिला…………………….. ………………
हर ओर लूट का मेला है, लुण्ठित सी पड़ी है मनस्विता,
सुवर्ण शकुनि निज भारत की, कुण्ठित हुई है यशस्विता।
समरसता कण्टकाकीर्ण हुई, सौहार्द पड़ा सकुचाय रहा,
रक्षिता-पालिता वसुधा का ,वैभव निशि-दिन मुरझाय रहा।
सस्मित है ये देख-देख, तत्पर अपने ही अपनों के भक्षण को,
उठो! शास्त्र को छोड़-छाँड़, शस्त्र उठा राष्ट्र के रक्षण को।
कृशकाय नहीं तेरा पौरुष, राष्ट्रीयता हर हृदय उतार रही।
सिद्धांतों की शिला…………………….. ………………