ब्लॉक कोथावां में वोटर लिस्टों की बिक्री के नाम पर हो रही अवैध वसूली

अभिव्यक्ति के दंश

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

एक–
ऐ हुस्न की मलिक:! आँखें यों मला न करो,
वही तस्वीर है, जो छोड़कर तुम आयी थी।
दो–
अब लौटकर न आयेगी फिर से बहार,
मेरे आँसू में देख! चाँद-तारे डूब रहे।
तीन–
कैसे मान लिया आवाज़ दब गयी मेरी,
क़ब्रगाह दहल उठता है गूँज उठने पे।
चार–
बेशक, ख़राब ही नहीं, बेहद ख़राब हूँ मैं,
अच्छे को बेहद अच्छा, सलीक़े से बनाता हूँ।
पाँच–
ज़िन्दगी रोकर कटी तो कटी ही क्या?
बेहतर है मौत को गले लगाकर जी लें।
छ: —
मैं रहूँ, न रहूँ, फ़र्क़ भी क्या पड़ता है?
तेरा बेपर्द: होना लाज़िमी लगने है लगा।
सात–
घर से धुआँ उठा, जो बहुत दूर तक गया,
दामन से लिपटते ही हवा कर गया हमें।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज ; ११ मार्च, २०२१ ईसवी।)

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