वेदना

जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद


वेदना         चीत्कार       करती,
है     हृदय      को         तोड़ती।
मुश्किलों      में      हौंसलों     के,
तार      को       नित     खोजती।
खीझ  सी   उठती    है   मन    में,
है पाषाण सम आँखों को नोंचती।
मानो    धमनियाँ     शिथिल   हो,
रक्त            को       झकझोरतीं।
चित्त   शान्त  होने  को व्यथित है,
बुद्धि    गह्वर   में   ही   कौंधती।

अर्ज़ किया है—–


मैं कर्म की चक्की चला रहा ऐ!ज़िन्दगी,

तू नित प्रश्न पत्र की कठिनता पर ध्यान दे।
मेरी परवरिश नागफ़नी की देख-रेख में हुई है,
वह कोई और होगा जिसे फूलों की चाह होगी।
निरुत्तर ही हैं मेरी धड़कनें अब तक,
उच्छवास और श्वास में विभेद क्यों है?