विलक्षण शब्दशक्ति

शब्द की उष्मा;
शब्द की कान्ति;
शब्द की संगति;
शब्द की ऊर्जा;
सार्थक तभी होती है
जब शब्दकार–
साधनापथ से आ जुड़ता है।
शब्द सात्त्विक होता है,
तुम ही अपने आचरण की सभ्यता मे रँगकर,
उसे राजसी बनाते हो और तामसिक भी।
शब्द–
अहम् और त्वम् नहीँ;
सम्प्रदाय और पन्थ नहीँ;
अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक नहीँ;
जाति और वर्ग नहीँ;
रहित और सहित भी नहीँ।
निर्दोष धरती के गर्भ मे–
विषाक्त शब्दबीज-वपन कर,
अंकुरण का श्रेय प्राप्त करनेवाले;
विभाजनरेखा खीँचनेवाले;
निर्धन और दलित की खेती करनेवाले;
अवर्ण और सवर्ण का हल चलानेवाले;
अन्तत:, गर्हित मानसिकता के साथ
अपने विफल होते जीवन की
पटकथा लिखने के लिए विवश हो जाते हैँ।
हर शब्द को अपने विकृत खाँचे मे–
समायोजित करने का,
कुत्सित प्रयास करते रह जाते हैँ।
शब्दशक्ति–
अभिधा-रूप मे सीने पर मुष्टिका-प्रहार करती है।
शब्दशक्ति–
लक्षणा-रूप मे चक्करघिन्नी-भाँति नचाती रहती है।
शब्दशक्ति–
व्यंजना-रूप मे न जीने देती है और न मरने।
शब्द का अन्यथा प्रयोग
रक्त-कैंसर से भी घातक है।
रक्त-कैंसर तो मार डालेगा;
परन्तु शब्द–
पल-पल तड़पाता रहेगा;
न जी पाओगे और न ही मर पाओगे।
‘त्रिशंकु-सदृश’ जीवन-मृत्यु के बीच
पश्चात्ताप और प्रायश्चित्त को
स्वयं को थामे रहे अनुभव करोगे।
तुम पश्चात्ताप करते हुए,
प्रायश्चित्त के सर्वांग पर–
कातर दृष्टि-अनुलेपन करते रह जाओगे;
शब्द विहँसता रहेगा; खिलखिलाता रहेगा
अन्तत:, मौन को चीरता हुआ,
तुमसे मूक संवाद भी करता रहेगा
और समय चलचित्र-भाँति
तुम्हारी कर्मकुण्डली का प्रदर्शन करता,
डग भरता रहेगा।
तुम्हारी आँखेँ–
निर्धन, निशक्त और निरुपाय हो,
अपने कपोलोँ पर ढुलकते प्रश्नभरे आँसू से
तुम्हेँ आड़ी, सीधी, तिरछी बेधती रहेँगी।
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(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १७ जुलाई, २०२४ ईसवी।)