
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
भूख से बिलबिलाती आँतें;
चीथड़ों में लिपटी-चिपटी
अपनी पथराई आँखें पालती;
टुकुर-टुकुर ताकती
आँखों से झपटने की तैयारी करती
मेले-झमेले की गवाह बनती;
आस-विश्वास की फटही झोली लिये
तमन्नाओं-अरमानों की लाश ढोती
फफोलों से सजी हथेलियों की
रेखागणित पढ़ते
होठों को बिचकाते, फफकाते
अपने गालों पर ढुलक रहे
अश्रुओं की व्यथा-कथा
गीली वसुधा के वक्षस्थल पर
रचती जा रही है।
सम्भ्रान्त जोड़े के ‘फ़ास्ट फ़ूड’ पर
टिकता-फिसलता बेबस-कमज़ोर मन
भयाक्रान्त हो उठता है;
मरमरी बाँहें सिकुड़ने लगती हैं
और पाँव सकुचाये-सहमे
अपनी खोली में लौट पड़ते हैं।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय; १० जुलाई, २०१८ ईसवी)