नितिन गडकरी ने सत्ताधारियों की चड्ढी उतारी..?

● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

नितिन गडकरी ने २३ जुलाई को महाराष्ट्र मे आयोजित एक समारोह मे कहा था, “मन करता है, राजनीति छोड़ दूँ। महात्मा गांधी के समय की राजनीति और आज की राजनीति मे बहुत बदलाव हुआ है। बापू के समय मे राजनीति देश, समाज, विकास के लिए होती थी; लेकिन अब राजनीति ‘सिर्फ़ सत्ता’ के लिए होती है। हमे समझना होगा कि राजनीति का क्या मतलब है। क्या यह समाज देश के कल्याण के लिए है या सरकार मे रहने के लिए है?”

वास्तव मे, भारतीय जनता पार्टी मे यदि कोई श्रेष्ठ नेता है तो एकमात्र ‘नितिन गडकरी’। यह व्यक्ति शुरू से ही नरेन्द्र मोदी की जनघाती नीतियों पर प्रत्यक्ष-परोक्ष प्रहार करता आ रहा है। यदि नितिन गडकरी को प्रधानमन्त्री बना दिया जाये तो एक वर्ष के भीतर तरक़्क़ी की राह दिखने लगेगी और घृणित मत-मतान्तर और आचरण की कलुषित-कुत्सित सभ्यता की अवधारणा समाप्ति के मार्ग पर बढ़ती दिखेगी।

स्वाभिमानी राजनेता नितिन गडकरी कभी पद-प्रतिष्ठा के प्रति लालायित नहीं दिखे हैं। उन्होंने उन घृणित नेताओं की अच्छी ख़बर लेते हुए, उन्हें राजनीति क्या है, इसे समझने की सीख सिखाते हुए, दो टूक कहा था, “राजनीति गांधी के युग से ही सामाजिक आन्दोलन का हिस्सा रही है। उस समय राजनीति का इस्तेमाल देश के विकास के लिए होता था। आज की राजनीति पूरी तरह से सत्ता-केन्द्रित है।”

इतना ही नहीं, गडकरी ने आज (२५ जुलाई) ‘विधानसभा मे संसदीय लोकतन्त्र और जन-अपेक्षाएँ’ विषय पर विचार प्रकट करते हुए, व्यंग्यकार शरद जोशी को माध्यम बनाते हुए, ‘न्यू इण्डिया की मोदी-सरकार की नीतियों पर कटाक्ष करते हुए कहा, “शरद जोशी ने लिखा था, “जो राज्यों मे काम के नहीं थे, उन्हें दिल्ली भेज दिया गया; जो दिल्ली मे काम के न थे, उन्हें गवर्नर बना दिया गया और जो वहाँ भी काम के न थे, उन्हें एम्बेसडर बना दिया गया।”

नितिन गडकरी ने ‘मन की बात’ करते हुए कह ही दिया, “भा०ज०पा०-अध्यक्ष रहते मुझे ऐसा कोई नहीं मिला, जो दु:खी न हो।”

अभी कुछ ही दिनो-पूर्व नितिन गडकरी का यह कथन आग मे घी का काम करता दिखा; परन्तु मजाल कि कोई गडकरी से आँखें मिला सके। उन्होंने कहा था, “आजकल हर किसी की समस्या है; हर कोई दु:खी है। जो मुख्यमन्त्री बनते हैं, वो इसलिए परेशान रहते हैं कि पता नहीं कब हटा दिये जायें। विधायक इसलिए दु:खी हैं कि वो मन्त्री नहीं बन पाये; मन्त्री इसलिए दु:खी हैं कि उन्हें अच्छा विभाग नहीं मिला; अच्छे विभागवाले इसलिए दु:खी हैं कि वे मुख्यमन्त्री नहीं बन पाये।”

हर छोटी-छोटी योजना मे अपने फ़ोटो लगवाने का जिन नेताओं को शौक चर्राया हुआ है, उनके गालों पर भरपूर तमाचा मारने का काम नितिन गडकरी का यह कथन करता है, “मैने समाजवादी राजनेता जॉर्ज फर्नाण्डीज़ की सादगीपूर्ण जीवनशैली से बहुत कुछ सीखी है; क्योंकि उन्होंने सत्ता की भूख की कभी परवाह नहीं की थी। जब लोग मेरे लिए गुलदस्ता लाते हैं या मेरे बड़े-बड़े पोस्टर लगाते हैं तब उससे मुझे बहुत नफ़्रत है।”

यह तो ऐसा उदाहरण है, जो जीवन्त है; न जाने ऐसे कितने लोग हैं, जो कथित मोदी-सरकार के साथ किसी-न-किसी रूप मे जुड़े हुए हैं; लेकिन नितिन गडकरी की तरह से बोलने का साहस न कर पाते हों। वैसे पिछले दिनो राजनाथ सिंह ने इस आशय की बात की थी– मै किसी भी पी० एम० की कार्यनीति को छोटा करके नहीं देखता।

एक बात तो सुस्पष्ट होती जा रही है कि जिस गति मे ‘नरेन्द्र मोदी ऐण्ड कम्पनी’ को लोकप्रियता मिली थी, उसमे अब ‘खटाश’ ने डेरा और घेरा डाल दिया है; अभी विरोध मे अन्य के स्वर भी उभरेंगे, आशा की जा सकती है।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २५ जुलाई, २०२२ ईसवी।)