महेन्द्र महर्षि ( सेवानिवृत्त अधिकारी, दूरदर्शन )
“हार गए लेकिन रिज़ल्ट अच्छा रहा – राहुल गांधी ।
कॉंग्रेस अध्यक्ष का यह वाक्य आज टी.वी. चैनलों पर देखने-सुनने को मिला। निश्चित ही यह एक सरल व्यक्ति का सहज बयान है। अगर चालाक नेता होता तो पहले तो यह मानता ही नहीं कि वे पराजित हो गए हैं। अगर स्वीकृत करता भी तो अपने को पोजिटिव रूप में पेश करता। कहता , “ सरकार नहीं बना सके लेकिन रिज़ल्ट अच्छा रहा “। या यों कि, “रिज्लट अच्छा रहा अगली सरकार भी हमारी ही होगी”। राहुल चल निकले हैं , यह गुजरात ने सिद्ध कर दिया। है। अब बाक़ी है अपने को चतुर सुजान बनाते हुए राजनीति की भाषा बोलना सीखना।
शुरू में उनके पिता भी ऐसे ही थे और जब माहिर हुए तो असमय ही षड्यंत्र की बलि चढ़ गए। हमें एक सक्षम विपक्षी पार्टी की ज़रूरत है और यह अच्छा संकेत है कि खिचड़ी विपक्ष की बजाए एक टक्कर देने वाला विरोधी दल पनपे जिसका नेतृत्व कोई युवा करे। यह सब बकवास और थोथा शोर है कि वंशवाद नहीं होना चाहिए। योग्यता और अनुभव के आधार पर ही लोकतंत्र का नेतृत्व किया जा सकता है। देश की जनता भी तैय्यार हो गई है वर्ना सरकार में खलबली न देखी जाती। 2019 बहुत दूर नहीं है इसलिए सभी कमर कस रहे हैं। कांग्रेस को देश के स्तर पर गुजरात जैसा ही काम करना होगा। अगर वो सरकार में वापसी करती है तो अच्छा है और नहीं भी तो खिचड़ी विपक्ष से अगली लोकसभा को बचाना होगा। राष्ट्रीय स्तर पर मज़बूत लोकतंत्र के लिए संतुलित पक्ष और विपक्ष का होना श्रेयस्कर होगा। ख़ासतौर पर खिचड़ी सरकार तो नहीं होनी चाहिए। विकास और प्रगति के लिए यह ज़रूरी है। आशा की जानी चाहिए कि राहुल अपनी पार्टी को बाँधने में सफल होंगे। उनके काम से ही उन पर लगे टैग हट सकते हैं।