‘मौलाना मुलायम’ की हकीकत तो सबको मालूम ही है कि वह एक जाति विशेष और मजहब विशेष के नेता थे। उत्तर प्रदेश के यादवों के लिए वह ‘अंबेडकर’ और शांति दूतों के लिए ‘जिन्ना’ से कम न थे।
एक मजहब का वोट पाने के लिए उन्होंने राम भक्तों पर गोली चलवाई। अलग राज्य उत्तराखंड की मांग करने वालों पर बर्बरता की हदें पार कर दी गई, महिलाओं की अस्मत लूटी गई। हालांकि इस सब का परिणाम उन्हें जीते जी ही मिल गया। जब उनके ही कु-पुत्र ने उनकी बेइज्जती करने में कोई कसर न छोड़ी। भरी सभा में उनके हाथ से माइक तक छीन लिया था।
लेकिन कहते हैं कि किसी की मृत्यु के बाद उसके अच्छे कामों को याद करना चाहिए। तो मुझे तमाम प्रयासों के बाद उनके दो अच्छे कार्य याद आते हैं । पहला यह कि उनकी पार्टी के शासनकाल के दौरान उत्तर प्रदेश में प्रमोशन में आरक्षण खत्म कर दिया गया था तथा एससी एसटी एक्ट भी तब उतना ‘काला’ और क्रूर नहीं था। दूसरा यह कि शहीद सैनिकों के पार्थिव शव को सम्मानपूर्वक उनके घर पहुंचाने की व्यवस्था उनके रक्षामंत्री रहते हुए की गई।
और
एक यह घटना जो बताती है कि रक्षा मंत्री बनने के बाद भी मुलायम यादव “अपने लोगों” का किस हद तक सपोर्ट करते थे।
मुलायम यादव उस समय रक्षा मंत्री थे। किसी सरकारी कार्य से एयरफोर्स एकेडमी, हैदराबाद आए थे। वहीं पर इटावा जिले के उनकी जान पहचान के किसी व्यक्ति का लड़का एयरफोर्स में कार्यरत था। यह बात उन्हें पता थी। उन्होंने एयरफ़ोर्स अधिकारियों से उस लड़के को बुलाने को कहा तो एयरफोर्स के बड़े अधिकारियों में हड़कंप मच गया।
उसे बिलेट (बैरक) से बुलाया गया और रास्ते भर उसकी काउंसलिंग होती रही कि रक्षा मंत्री से मेस के खाने, वहां के रहन-सहन या किसी अधिकारी के विरुद्ध कुछ गलत न बोल देना। इटावा का वह वायुसैनिक तत्कालीन रक्षा मंत्री मुलायम यादव से मिला तो मुलायम यादव ने उससे पूछा -“
बेटा, सब ठीक तो है न? कोई समस्या तो नहीं है तुम्हें यहां पर ?? “
चूंकि उस वायुसैनिक की पर्याप्त काउंसलिंग पहले ही हो चुकी थी। इसलिए उसने कहा -” चाचाजी, सब ठीक है । कोई समस्या नहीं है। बस घर से काफी दूर है। आने जाने में परेशानी होती है। काफी समय लग जाता है ।”
इस पर मुलायम यादव ने कहा-” तो क्या चाहते हो बेटा? खुलकर बताओ”
इटावा के उस वायुसैनिक ने झिझकते हुए कहा-” अंकल जी अगर मेरी पोस्टिंग(ट्रांसफर) कानपुर हो जाती तो अच्छा रहता।”
इस वार्तालाप के समय उपस्थित लोग कहते हैं कि अगर इटावा वाला वह वायु सैनिक उस समय कुछ भी मांग लेता, जो रक्षा मंत्री के वश में होता तो शायद उसे मिल जाता। लेकिन शायद उसके संस्कारों ने उसे ऐसा करने से रोक दिया। उसने सागर से बस एक बूंद ही मांगी।
अब मुझे यह तो बताने की जरूरत है नहीं कि अगले कुछ ही दिनों में इटावा वाले उस वायु सैनिक की पोस्टिंग कानपुर हो गई।
मेरी दिली ख्वाहिश थी कि नेताजी कुछ दिन और जी जाते तथा जिस राम मंदिर के निर्माण में उन्होंने हजारों रोड़े अटकाए, निर्दोषों का खून बहाया, उस भव्य और दिव्य राम मंदिर का निर्माण कार्य अपनी आंखों से देखकर जाते।
खैर, रामद्रोही मुलायम यादव को भगवान राम अपने श्री चरणों में स्थान दें, यही कामना है।
(विनय सिंह बैस)