राघवेन्द्र कुमार ‘राघव’ (स्वतन्त्र पत्रकार, हरदोई)–
तीन मौजूदा नागरिक निकाय, पूर्वी दिल्ली नगर निगम (ईडीएमसी), उत्तरी दिल्ली नगर निगम (एनडीएमसी) और दक्षिणी दिल्ली नगर निगम (एसडीएमसी) 22 मई, 2022 को दिल्ली नगर निगम के रूप में एक इकाई में फिर से एकीकृत हो गए हैं । एकीकृत एमसीडी का प्रधान कार्यालय डॉ. एसपी मुखर्जी सिविक सेंटर, जेएलएन मार्ग, नई दिल्ली- 110002 में स्थित है। दिल्ली नगर निगमदिल्ली के लगभग 20 मिलियन नागरिकों को नागरिक सेवाएं प्रदान करने वाली दुनिया के सबसे बड़े नगर निकायों में से एक है। इसका क्षेत्रफल 1397.3 वर्ग किलोमीटर है। किमी. जो 12 क्षेत्रों में उप-विभाजित है अर्थात केंद्र, दक्षिण, पश्चिम, नजफगढ़, रोहिणी, सिविल लाइंस, करोल बाग, एसपी-सिटी, केशवपुरम, नरेला, शाहदरा उत्तर और शाहदरा दक्षिण।
भाजपा का उद्देश्य–
विधेयक के उद्देश्यों एवं कारणों में कहा गया है कि वर्ष 2011 में दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी राज्य क्षेत्र की विधानसभा द्वारा दिल्ली नगर निगम संशोधन अधिनियम 2011 द्वारा उक्त अधिनियम को संशोधित किया गया था जिससे उक्त निगम का तीन पृथक निगमों में विभाजन हो गया।
दिल्ली नगर निगम के तीन भागों में विभाजन करने का मुख्य उद्देश्य जनता को अधिक प्रभावी नागरिक सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए दिल्ली में विभिन्न केंद्रों में नगर पालिकाओं का सृजन करना था, फिर भी दिल्ली नगर निगम का तीन भागों में विभाजन राज्य क्षेत्रीय प्रभागों और राजस्वसर्जन की संभाव्यता के अर्थ में असमान था।
इसमें कहा गया है कि समय के साथ तीनों नगर निगमों की वित्तीय कठिनाइयों में वृद्धि हुई जिससे वे अपने कर्मचारियों को वेतन और सेवानिवृत्ति के फायदे प्रदान करने में अक्षम हो गये।
वेतन और सेवानिवृत्ति के फायदे प्रदान करने में देरी का परिणाम कर्मचारियों द्वारा निरंतर हड़ताल के रूप में सामने आया जिसने न केवल नागरिक सेवाओं को प्रभावित किया बल्कि इससे सफाई और स्वच्छता से संबंधित समस्याएं भी उत्पन्न हुईं।
तीन नगर निगमों की ऐसी वित्तीय कठिनाइयों का परिणाम उनकी संविदा संबंधी और कानूनी बाध्यताओं को पूरा करने में अनियमित विलंब के रूप में हुआ जिसने दिल्ली में नागरिक सेवाओं के बनाए रखने में गंभीर बाधाएं खड़ी की।
केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से शुक्रवार को लोकसभा में पेश दिल्ली नगर निगम अधिनियम-1957 में संशोधन करने संबंधी दिल्ली नगर निगम (संशोधन) विधेयक- 2022 में दिल्ली सरकार यानी सरकार के स्थान पर केंद्र सरकार कर दिया। संसद के दोनों सदनों में यह विधेयक पास होने के बाद दिल्ली नगर निगम के कामकाज से दिल्ली सरकार का कोई वास्ता नहीं रहेगा।
दिल्ली नगर निगम सीधे तौर पर केंद्र के अधीन आ जाएगा। गृह मंत्रालय ने दिल्ली सरकार से दिल्ली नगर निगम अधिनियम की 17 धाराओं का अधिकार भी लेने का निर्णय लिया है। विशेषज्ञों के अनुसार दिल्ली नगर निगम का आयुक्त नियुक्त करने में दिल्ली सरकार की कोई भूमिका नहीं रहेेगी। इसके अलावा दिल्ली सरकार न तो दिल्ली नगर निगम के अधिकारियों को तलब कर सकेगी और न हीनिगम को कामकाज के मामले में निर्देश दे सकेगी।
निगम चुनाव नहीं होने तक भी दिल्ली सरकार प्रत्यक्ष ही नहीं, अप्रत्यक्ष तौर पर भी निगम की कमान नहीं संभाल पाएगी। दरअसल नगर निगम के चुनाव नहीं होने तक उसकी कमान किसी वरिष्ठ आईएएस अधिकारी या फिर सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी को प्रशासक नियुक्त करके दी जाएगी। निगम प्रशासक भी केंद्र ही नियुक्त करेगा।
2017 व 2022 परिसीमन तुलना—
- 2007 के परिसीमन में ऐसे ही हुआ था : वर्ष 2007 में एमसीडी का परिसीमन हुआ था। तब अधिकतम 300 वार्डों पर सहमती बनी थी। लेकिन 68 विधानसभाओं में समान रूप से चार वार्ड की संरचना को ध्यान में रखते हुए 272 वार्ड बनाने पर मुहर लगाई गई। पार्षदों को चुनावों के लिए वार्ड बुलाने की अधिसूचना 10 मार्च 2007 को जारी की गई थी।
- 2017 में वार्डों की सीमाएं जरूर घटाई-बढ़ाई गईं। इसके कारण कई विधानसभाओं में तीन तो कई में पांच वार्ड भी आए। हालांकि मौजूदा परिसीमन में फिर से प्रत्येक विधानसभा में समान वार्ड रखे जाने की संभावना जताई जा रही है।
- 2017 मे हुए परिसीमन को लेकर कांग्रेस और बीजेपी ने आपत्ति जतायी थी। चुनाव आयोग ने बैठक की और सारी पार्टियों को बुलाया। इसमें जनसंख्या के आधार पर वार्ड का चयन और एससी सीटों को लेकर विचार हुआ। बीजेपी और कांग्रेस का कहना था कि किसी वार्ड की जनसंख्या 80000 से ज्यादा है तो किसी में 50000 से नीचे, जबकि चुनाव आयोग ने 60000 की जनसंख्या को लेकर वार्ड बनाने की बात कही थी। (2022 के परिसीमन मे जनसंख्या का आधार नज़र ही नहीं आता है, जबकि 2017 के परिसीमन मे औसत जनसंख्या आकार 60,000 प्रति वार्ड रखा गया है।)
- दूसरी आपत्ति एससी सीट को लेकर थी। लेकिन बीजेपी और कांग्रेस के अलग-अलग सुर थे। कांग्रेस हर विधानसभा सीट में एक वार्ड एससी के लिए चाहती थी और बीजेपी का मत एससी जनसंख्या के आधार पर रिजर्व सीट तय करना था। यानी अगर एक विधानसभा के चार वार्डों में से 3 में भी एससी जनसंख्या ज्यादा हो तो तीनों सीटों को एससी सीट बना देना चाहिए।
- उत्तरी दिल्ली में कुल आबादी 62.54 लाख से अधिक है। यहाँ एससी आबादी 12.12 लाख (19.38 प्रतिशत) है। यहाँ 104 वार्ड में से 20 एससी सीट हैं।
- दक्षिणी दिल्ली की आबादी 62.14 लाख और एससी आबादी 8.79 लाख से अधिक (14.15 प्रतिशत) है। यहां 104 में से 15 सीटें आरक्षित हैं।
- पूर्वी दिल्ली की 64 वार्ड में 11 सीटें आरक्षित हैं और यहां आाबादी 39.49 लाख से अधिक व एससी 654998 (16.58 प्रतिशत) हैं।
- निगम में एससी सीटों की संख्या 46 होगी और महिलाओं के लिए 50 फीसदी सीटें आरक्षित की गई हैं।
विशेष टिप्पणियाँ—
राज्य की सत्ताधारी पार्टी को केन्द्र में बड़े संख्याबल के आधार पर अलग-थलग करने की कोशिश।
राज्य की अनेक प्रशासनिक गतिविधियों से सत्ताधारी दल को बेदखल करना।
विरोधी पार्टी को कमज़ोर करने के लिये संविधान का दुरुपयोग।
दिल्ली नगर निगम के ड्राफ्ट के अनुसार निगम दिल्ली सरकार के समान्तर एक व्यवस्था है, इस तरह दिल्ली की विधान सभा को ही कमजोर करने का प्रयास जारी है।
संविधान विशेषज्ञ और लोकसभा और दिल्ली विधानसभा के पूर्व सचिव एसके शर्मा ने कहा कि वार्डों की संख्या और सीमाओं में बदलाव एक लंबी और जटिल प्रक्रिया है “आयोग पहले अपने वार्डों की अनुशंसित संख्या और उनकी सीमाओं के आधार पर एक मसौदा प्रस्तुत करेगा जिसके बाद सुझाव और आपत्तियां लेने के लिए इसे सार्वजनिक डोमेन में रखा जाएगा।” आम तौर पर, ऐसे परिसीमन आयोगों को 6-12 महीने का समय दिया जाता था या समय सीमा का स्पष्ट रूप से उल्लेख नहीं किया जाता था, लेकिन ऐसा लगता है कि केंद्र चाहता है कि यह चार महीने की सीमा निर्दिष्ट करके एक समयबद्ध प्रक्रिया हो।
सुभाष आर्य, पूर्व महापौर ने कहा कि पिछले अनुभवों के आधार पर, सही तरीके से परिसीमन के बाद चुनाव व्यावहारिक रूप से 2023 से पहले नहीं हो सकते हैं।
कुल मिलाकर भाजपा ऐनकेनप्रकारेण आम आदमी पार्टी को बैकफुट पर धकेलना चाहती है और इसके लिये अपनी तानाशाही व प्रशासनिक मशीनरी का खुलकर दुरुपयोग कर रही है।
