बेबस और लाचार जवानी की सुनो रामकहानी

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

किसी स्थान पर करोड़ों की संख्या मे लोग उपस्थित थे। वहाँ के एक चतुर-चालाक मालदार सेठ ने डुगडुगी पिटवा दी थी– सुनो-सुनो! देश के बेरोज़गार युवक-युवतियो! सरकारी फ़र्मान (‘फ़रमान’ अशुद्ध है।) है कि काम पाने-लायक स्वयं को सिद्ध करने के लिए प्रति बेरोज़गार ₹१८० लिये जायेंगे; जिस किसी को काम पर लगने की जल्दी हो, वे सेठ के खाते मे रुपये जमा करा दें और हाँ, काम मिलने की कोई गारण्टी नहीं। इसके लिए एक परीक्षा आयोजित की जायेगी, जो रोज़गार पाने की क़बिलीयत (‘क़ाबिलियत’ अशुद्ध है।) दिखाने की रहेगी।

उसी बीच, सेठ का एक कारिन्दा आता है। वह सभी को समझाता है :— काम मिलने की कोई ‘गारण्टी’ नहीं है; काम मिलनेवालों की लाइन मे लगने के लिए प्रतिव्यक्ति ₹१८० देने होंगे। ₹१८० देने के बाद ही लाइन मे खड़े रहने की स्थिति मे रहोगे। जैसे ही एक साल बीत जायेगा, तुम्हें लाइन से हटा दिया जायेगा; बोलो मंज़ूर है? उनमे से ३७ लाख लोग मंज़ूरी के समर्थन मे हाथ उठा देते हैं।

उनकी क़ाबिलीयत परखने के लिए कई प्रकार के जंगल, पर्वत, पहाड़, कन्दरा, खाई, टापू आदिक स्थान निर्धारित किये जाते हैं। बेचारे लाखों विद्यार्थी वहाँ गिरते-पड़ते-लड़खड़ाते पहुँचते हैं, जिनमे से बड़ी संख्या मे महिलाएँ भी रहती हैं। उन्हीं मे से कुछ महिला-पुरुष दुर्गम मार्ग देखकर भाग खड़े होते हैं; जो बचे रह जाते हैं, उनकी परीक्षा की जाती है। उसके पश्चात् वे बेदम-मरियल और हारे हुए जुवारी-से बेहाल होकर अपने-अपने घर लौटते हैं। उधर, सेठ गणित लगाता है तब एक साथ बैठे-बैठाये ₹६० करोड़ पाकर निहाल हो जाता है।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १८ अक्तूबर, २०२२ ईसवी।)