डॉ० राघवेन्द्र कुमार राघव–
दिल तोड़कर मेरा, मुझको रुला कर चल दिए, मेरी आँखों में ग़म का समंदर बसा कर चल दिए। मैंने कब माँगा था तुमसे उम्र भर का साथ राघव, क्यों मेरी उम्मीदों के घर को जला कर चल दिए। तेरी चाहत थी मेरी इबादत से भी बढ़कर साथी, उसी मासूम चाहत का जनाजा उठा कर चल दिए। मैंने हर इल्ज़ाम को ख़ामोश रहकर सह लिया, मेरी ख़ामोशी को मेरा गुनाह बताकर चल दिए। जिसके हर इक ख़्वाब में बस नाम तेरा ही रहा, तुम उसी की नींद से सपने चुराकर चल दिए। हमने चाहा था तुम्हें, तुमसे कोई उम्मीद न थी, क्यों मोहब्बत पर मेरी तोहमत लगा कर चल दिए। अब तुम्हें आवाज़ देना भी मुनासिब नहीं है राघव, चाक कर मेरा गला तड़पता छोड़ा और चल दिए।