अनियमित मानसून, घटता जल भंडार और वैश्विक कृषि बाजार : भारतीय किसानों की आय-सुरक्षा के लिए नई रणनीति की आवश्यकता

वर्षा की अनिश्चितता, जल संसाधनों पर बढ़ते दबाव और अंतरराष्ट्रीय कृषि जिंसों की कीमतों में उतार-चढ़ाव के बीच भारतीय कृषि को उत्पादन-केंद्रित व्यवस्था से आगे बढ़कर जलवायु-अनुकूल, लागत-कुशल और लाभकारी कृषि प्रणाली की ओर ले जाना समय की मांग है।

भारतीय कृषि आज ऐसे दौर से गुजर रही है, जिसमें उत्पादन का जोखिम केवल मानसून की मात्रा तक सीमित नहीं रह गया है। वर्षा का असमान वितरण, भूजल और जलाशयों पर दबाव, कृषि आदानों की बढ़ती लागत, वैश्विक बाजार में कीमतों की अस्थिरता तथा कृषि उपज के विपणन की चुनौतियां मिलकर किसानों की आय को प्रभावित कर रही हैं। ऐसी परिस्थिति में कृषि की स्थिति का आकलन केवल कुल बुवाई क्षेत्र या खाद्यान्न उत्पादन के आधार पर करना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए प्रति हेक्टेयर उत्पादकता, प्रति इकाई जल का उपयोग, उत्पादन लागत, बाजार में प्राप्त मूल्य और किसानों की शुद्ध आय का समेकित विश्लेषण आवश्यक है।

वर्ष 2026 का दक्षिण-पश्चिम मानसून इस चुनौती का एक महत्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करता है। उपलब्ध मौसमी आंकड़ों के अनुसार, मानसून ने जुलाई के आरंभ तक पूरे देश को कवर कर लिया था, लेकिन सितंबर के अंत तक मौसमी वर्षा सामान्य से 12.6 प्रतिशत कम रही। भारत मौसम विज्ञान विभाग के आंकड़ों पर आधारित समकालीन रिपोर्टिंग भी इस वर्ष वर्षा की कमी की पुष्टि करती है। इससे स्पष्ट होता है कि मानसून का देशव्यापी आगमन और कृषि के लिए पर्याप्त तथा समयानुकूल वर्षा मिलना दो अलग-अलग स्थितियां हैं। इसलिए कृषि नीति का उद्देश्य केवल फसल उत्पादन बनाए रखना नहीं, बल्कि मौसम और बाजार के संयुक्त जोखिमों के बीच किसानों की आय, आजीविका और उत्पादन क्षमता की रक्षा करना भी होना चाहिए।

मानसून भारतीय कृषि की जलापूर्ति, बुवाई, फसल वृद्धि और जलाशयों के पुनर्भरण का प्रमुख आधार है। किंतु मौसमी वर्षा का राष्ट्रीय औसत अपने आप में कृषि संकट की पूरी तस्वीर प्रस्तुत नहीं करता। वर्षा की मात्रा के साथ उसका समय, वितरण, तीव्रता और फसल की संवेदनशील अवस्था में उपलब्धता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। यदि बुवाई के समय पर्याप्त नमी उपलब्ध नहीं होती, तो बीज अंकुरण और पौधों की स्थापना प्रभावित हो सकती है। वहीं, पुष्पन, दाना बनने और फल-विकास की अवस्थाओं में जल की कमी उपज तथा गुणवत्ता को कम कर सकती है। दूसरी ओर, कम समय में अत्यधिक वर्षा होने पर मिट्टी का कटाव, जलभराव और पोषक तत्वों का नुकसान बढ़ सकता है। इस प्रकार, कुल वर्षा सामान्य होने पर भी उसका असमान वितरण कृषि उत्पादकता को प्रभावित कर सकता है।

वर्ष 2026 में जुलाई के दौरान वर्षा में सुधार के बावजूद पूरे मानसून काल में दर्ज की गई कमी यह संकेत देती है कि मौसमी औसत और कृषि-उपयोगी वर्षा के बीच अंतर को समझना जरूरी है। विशेष रूप से वर्षा-आधारित क्षेत्रों में बुवाई का समय, मिट्टी की नमी और उपलब्ध सिंचाई सुविधाएं फसल के अंतिम परिणाम को निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

हालांकि, वर्षा में 12.6 प्रतिशत की कमी का अर्थ यह नहीं है कि देश का कृषि उत्पादन भी उतने ही प्रतिशत घट जाएगा। उत्पादन पर प्रभाव का वैज्ञानिक आकलन करने के लिए राज्यवार वर्षा, फसलवार क्षेत्रफल, मिट्टी की नमी, सिंचाई की उपलब्धता, तापमान और फसल की वर्तमान दशा का संयुक्त विश्लेषण करना आवश्यक है।

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 1 अक्टूबर 2026 को प्रमुख जलाशयों में उनकी कुल भंडारण क्षमता का 71.8 प्रतिशत जल उपलब्ध था, जबकि सामान्य स्तर 81.8 प्रतिशत और पिछले वर्ष का स्तर 90.3 प्रतिशत बताया गया। ये आंकड़े जल संसाधनों पर बढ़ते दबाव की ओर संकेत करते हैं।

सामान्य स्तर की तुलना में कम जल भंडारण का प्रभाव केवल वर्तमान खरीफ फसल तक सीमित नहीं रह सकता। इसका असर रबी की बुवाई, सिंचाई की उपलब्धता, पेयजल आपूर्ति और कुछ क्षेत्रों में पशुपालन पर भी पड़ सकता है। यदि जलाशयों में उपलब्ध पानी कम है, तो सिंचाई की मांग और जल वितरण के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ने की आशंका रहती है। यहां एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक अंतर समझना आवश्यक है। जलाशयों में उपलब्ध पानी और कृषि के लिए वास्तविक रूप से उपयोग किए जा सकने वाले पानी की मात्रा समान नहीं होती। जलाशय की स्थिति, नदी प्रवाह, जलाशय से निर्धारित निकासी, नहरों की दक्षता, भूजल की स्थिति और स्थानीय सिंचाई संरचना के आधार पर किसानों को मिलने वाला पानी अलग-अलग हो सकता है।

इसलिए जल प्रबंधन में निम्नलिखित उपाय प्राथमिकता के आधार पर अपनाए जाने चाहिए:

फसलवार सिंचाई नियोजन मे पानी की उपलब्धता के अनुसार फसलों और सिंचाई चक्र का निर्धारण किया जाए। सूक्ष्म सिंचाई के अन्तर्गत उपयुक्त फसलों और परिस्थितियों में ड्रिप तथा स्प्रिंकलर सिंचाई को बढ़ावा दिया जाए। वर्षाजल संचयन को प्रोत्साहित किया जाये। खेत-तालाब, मेड़बंदी, चेक डैम और जलग्रहण क्षेत्र विकास के माध्यम से वर्षा जल को स्थानीय स्तर पर रोका जाए। मृदा नमी संरक्षण की ओर भी ध्यान देना आवश्यक है। फसल अवशेषों का उपयुक्त उपयोग, मल्चिंग, संतुलित जुताई और जैविक पदार्थों की वृद्धि को प्रोत्साहित किया जाए। भूजल पुनर्भरण से स्थितियाँ काबू की जा सकती हैं। स्थानीय भूगर्भीय परिस्थितियों के अनुकूल संरचनाओं के माध्यम से वर्षाजल को जमीन में पहुंचाने के प्रयास किए जाएं।

इन उपायों की प्रभावशीलता क्षेत्र की मिट्टी, ढाल, फसल, जल की गुणवत्ता और लागत पर निर्भर करेगी। अतः सभी क्षेत्रों के लिए एक ही तकनीकी समाधान लागू करने के बजाय स्थानीय कृषि-जलवायु के अनुरूप रणनीति अपनानी चाहिए।

2 अक्टूबर तक खरीफ फसलों का कुल बुवाई क्षेत्र पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 1 प्रतिशत कम, लेकिन सामान्य क्षेत्रफल से लगभग 1 प्रतिशत अधिक बताया गया है। धान, गन्ने और कपास के क्षेत्र में कमी तथा दलहन, मोटे अनाज और तिलहन के क्षेत्र में वृद्धि का रुझान सामने आया है। यह बदलाव फसल चयन में संभावित पुनर्संयोजन का संकेत देता है। कम पानी उपलब्ध होने की आशंका में किसान कुछ क्षेत्रों में कम जल-आवश्यकता वाली फसलों को प्राथमिकता दे सकते हैं। दलहन, बाजरा, ज्वार और कुछ तिलहन फसलें ऐसी परिस्थितियों में उपयोगी विकल्प बन सकती हैं। फिर भी, किसी फसल को सार्वभौमिक रूप से कम जोखिम वाला मानना उचित नहीं होगा। उसकी जल आवश्यकता, बुवाई का उपयुक्त समय, मिट्टी की प्रकृति, स्थानीय तापमान, कीट-रोग दबाव और बाजार की उपलब्धता को ध्यान में रखना आवश्यक है।

फसल विविधीकरण का उद्देश्य केवल धान या कपास का क्षेत्र घटाना नहीं होना चाहिए। इसका वास्तविक उद्देश्य किसानों के लिए उत्पादन जोखिम कम करना, मिट्टी की उर्वरता बनाए रखना, जल संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग करना और बाजार में लाभकारी अवसर बढ़ाना है।

उदाहरण के लिए, दलहन फसलें उचित फसल चक्र में शामिल होने पर जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण के माध्यम से मृदा पोषण में योगदान दे सकती हैं। मोटे अनाज कई अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में उपयोगी विकल्प हो सकते हैं। इसी प्रकार, तिलहन फसलें खाद्य तेलों के घरेलू उत्पादन को बढ़ाने में मदद कर सकती हैं। लेकिन इन संभावनाओं को वास्तविक किसान-लाभ में बदलने के लिए प्रमाणित बीज, समय पर कृषि सलाह, उपयुक्त यंत्रीकरण, प्रसंस्करण सुविधाएं और सुनिश्चित बाजार आवश्यक हैं।

किसानों को केवल जलवायु संबंधी तर्कों के आधार पर किसी दूसरी फसल की ओर जाने के लिए प्रेरित करना पर्याप्त नहीं है। यदि वैकल्पिक फसल की उत्पादकता कम हो, मंडी दूर हो, खरीद व्यवस्था कमजोर हो या मूल्य में अत्यधिक उतार-चढ़ाव हो, तो जल की बचत के बावजूद किसान की शुद्ध आय घट सकती है।

अतः फसल विविधीकरण का आकलन प्रति हेक्टेयर शुद्ध आय, प्रति इकाई जल उत्पादकता और उत्पादन जोखिम के आधार पर किया जाना चाहिए।

भारतीय कृषि अब अंतरराष्ट्रीय बाजार से अलग-थलग नहीं है। खाद्य तेल, दलहन, कपास, चीनी, अनाज और कृषि उत्पादन में प्रयुक्त ऊर्जा तथा उर्वरकों के वैश्विक मूल्य घरेलू कृषि अर्थव्यवस्था को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करते हैं। वैश्विक कृषि जिंस बाजारों में कीमतों का निर्धारण कई कारकों से होता है:

  1. प्रमुख उत्पादक देशों में वर्षा, तापमान, सूखा, बाढ़ और अन्य मौसमी घटनाएं।
  2. वैश्विक उत्पादन, भंडार और खपत के बीच संतुलन।
  3. निर्यात प्रतिबंध, आयात शुल्क, व्यापार समझौते और भू-राजनीतिक तनाव।
  4. कच्चे तेल, प्राकृतिक गैस, उर्वरक और माल ढुलाई की लागत।
  5. मुद्रा विनिमय दर, अंतरराष्ट्रीय मांग और बाजार की अपेक्षाएं।

इन कारकों का प्रभाव सभी जिंसों पर एक समान नहीं पड़ता। उदाहरण के लिए, प्रमुख निर्यातक देशों में खाद्य तेलों के उत्पादन में कमी आने से अंतरराष्ट्रीय कीमतें बढ़ सकती हैं। इससे भारत में आयातित तेल की लागत और खाद्य महंगाई बढ़ने का जोखिम उत्पन्न हो सकता है। इसके विपरीत, यदि वैश्विक आपूर्ति बढ़ती है या मांग कमजोर होती है, तो अंतरराष्ट्रीय कीमतें नीचे आ सकती हैं।

किसानों के लिए इसका प्रभाव दोतरफा होता है। ऊंची वैश्विक कीमतें किसी निर्यात-उन्मुख फसल के घरेलू मूल्य को सहारा दे सकती हैं, लेकिन इसका लाभ तभी मिलेगा जब घरेलू बाजार, व्यापार नीति, गुणवत्ता मानक और खरीद व्यवस्था उस मूल्य को किसान तक पहुंचने दें। दूसरी ओर, अंतरराष्ट्रीय कीमतों में गिरावट का दबाव घरेलू उत्पादकों पर पड़ सकता है, भले ही उनकी उत्पादन लागत पहले से ऊंची हो।

इसलिए यह मान लेना उचित नहीं है कि वैश्विक जिंस कीमतों में वृद्धि से सभी भारतीय किसानों को लाभ होगा। लाभ का वास्तविक आकलन घरेलू मंडी मूल्य, आयात-निर्यात नीति, स्थानीय आपूर्ति, परिवहन लागत, गुणवत्ता और बिचौलिया संरचना को ध्यान में रखकर करना चाहिए।

किसान की आर्थिक स्थिति का आकलन केवल उपज की बिक्री से प्राप्त कुल राशि के आधार पर नहीं किया जा सकता। वास्तविक आर्थिक परिणाम उत्पादन लागत घटाने के बाद सामने आता है। यदि किसी फसल का बाजार मूल्य बढ़ता है, लेकिन उसी समय डीजल, बिजली, उर्वरक, कीटनाशक, बीज, सिंचाई और मजदूरी की लागत भी बढ़ जाती है, तो किसान की शुद्ध आय में अपेक्षित वृद्धि नहीं हो सकती। इसी प्रकार, मौसम के कारण उपज कम होने पर किसान को कम मात्रा में उत्पादन बेचने के साथ-साथ प्रति इकाई उत्पादन पर अधिक लागत भी वहन करनी पड़ सकती है।

इस स्थिति को समझने के लिए कृषि आय का आकलन निम्न आधारों पर किया जाना चाहिए:

पहला प्रति हेक्टेयर कुल उत्पादन और बिक्री योग्य उपज। दूसरा बीज, उर्वरक, श्रम, ऊर्जा, सिंचाई और मशीनरी की लागत। तीसरा कटाई, भंडारण, परिवहन और विपणन पर होने वाला खर्च। चौथा किसान को प्राप्त वास्तविक बिक्री मूल्य। पाँचवा मौसम और बाजार संबंधी जोखिमों के कारण होने वाला संभावित नुकसान।

कृषि लागत एवं मूल्य आयोग की मूल्य निर्धारण प्रक्रिया, न्यूनतम समर्थन मूल्य और वास्तविक मंडी कीमतों के बीच संबंध का अध्ययन भी इस विश्लेषण का महत्वपूर्ण हिस्सा होना चाहिए। न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित होना और किसान को उस मूल्य पर बिक्री का वास्तविक अवसर मिलना दो अलग बातें हैं। प्रभावी खरीद, स्थानीय खरीद केंद्र, समय पर भुगतान और बाजार तक पहुंच के बिना घोषित मूल्य का लाभ सीमित रह सकता है। इसीलिए किसानों की आय-सुरक्षा के लिए मूल्य समर्थन के साथ-साथ उत्पादन लागत घटाने, भंडारण सुधारने, किसान उत्पादक संगठनों को मजबूत करने और बाजार सूचना उपलब्ध कराने की जरूरत है।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था में गैर-कृषि गतिविधियों का महत्व बढ़ना एक महत्वपूर्ण संरचनात्मक बदलाव है। निर्माण, परिवहन, व्यापार, ग्रामीण सेवाओं, लघु उद्योगों और अन्य रोजगार स्रोतों से प्राप्त आय कुछ परिवारों को फसल उत्पादन से जुड़े जोखिमों के विरुद्ध सुरक्षा प्रदान कर सकती है।

हालांकि, इससे यह निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा कि कृषि का महत्व कम हो गया है या खराब मानसून का ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर प्रभाव सीमित रहेगा। कृषि से जुड़ी आय में कमी का असर कृषि मजदूरी, स्थानीय व्यापार, कृषि उपकरणों की मांग, ग्रामीण ऋण भुगतान और उपभोग पर भी पड़ सकता है। अतः ग्रामीण आय के विविधीकरण को कृषि का विकल्प बनाने के बजाय कृषि-आधारित आजीविका को मजबूत करने की पूरक रणनीति के रूप में देखा जाना चाहिए।

डेयरी, पशुपालन, मधुमक्खी पालन, बागवानी, खाद्य प्रसंस्करण और स्थानीय कृषि-सेवाएं अतिरिक्त आय के अवसर प्रदान कर सकती हैं। लेकिन इन गतिविधियों की सफलता के लिए चारा, पशु स्वास्थ्य, पूंजी, कौशल, बाजार और स्थानीय मांग का आकलन जरूरी है। नीति निर्माताओं को यह भी देखना चाहिए कि छोटे और सीमांत किसानों, भूमिहीन कृषि मजदूरों तथा महिला किसानों को इन वैकल्पिक गतिविधियों का कितना लाभ मिल रहा है। औसत ग्रामीण आय में वृद्धि अपने आप सभी ग्रामीण परिवारों की आर्थिक सुरक्षा में समान सुधार का प्रमाण नहीं है।

वर्तमान परिस्थितियों में कृषि जोखिमों से निपटने के लिए तकनीकी उपायों, संस्थागत सहायता और बाजार सुधारों को एक साथ लागू करना आवश्यक है।