नई दिल्ली। विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने नई दिल्ली में आयोजित 5वें कौटिल्य इकोनॉमिक कॉन्क्लेव के समापन सत्र को संबोधित किया। इस दौरान उन्होंने वैश्विक व्यवस्था में आ रहे बड़े बदलावों और भारत की रणनीतिक प्राथमिकताओं पर विस्तार से बात की। सत्र के दौरान डॉ. जयशंकर की सिंगापुर के पूर्व विदेश मंत्री जॉर्ज येओ योंग-बून और 15वें वित्त आयोग के अध्यक्ष व ‘इंस्टीट्यूट ऑफ इकोनॉमिक ग्रोथ’ के ट्रस्टी बोर्ड के अध्यक्ष एन. के. सिंह के साथ बेहद सार्थक और गहरी बातचीत हुई।
मंत्री ने कॉन्क्लेव में कहा कि वर्तमान वैश्विक व्यवस्था तेजी से पुनर्संतुलन की ओर अग्रसर है और ग्लोबल ऑर्डर एक बहुध्रुवीय दुनिया की ओर बढ़ रहा है। जयशंकर ने अपने संबोधन की एक वीडियो क्लिप सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर साझा की, जिसमें उन्होंने रेखांकित किया कि पुरानी गठबंधन संरचनाएं अब ढीली पड़ चुकी हैं, और इस बदलाव के साथ ही विश्व पटल पर एक नया ढांचा उभर रहा है।
डॉ. जयशंकर के अनुसार ‘फ्लक्स’ (अनिश्चितता और निरंतर बदलाव) के इस वर्तमान युग में राष्ट्रीय नीतियों के मुख्य गुण के रूप में ‘लचीलापन और अनुकूलन क्षमता’ बेहद जरूरी हो गई है। अपने संबोधन में विदेश मंत्री ने भारत के आंतरिक विकास और बाहरी कूटनीति के बीच के गहरे जुड़ाव को स्पष्ट किया। उन्होंने देश की विदेश नीति और आर्थिक व विकास लक्ष्यों के बीच मजबूत होते संबंधों पर विशेष प्रकाश डाला। डॉ. जयशंकर ने कहा कि आज भारत की कूटनीति केवल राजनीतिक संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश के आर्थिक विकास, व्यापारिक हितों, तकनीकी सुरक्षा और बुनियादी ढांचे के विकास को गति देने का एक प्रभावी माध्यम बन चुकी है।
डॉ. जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र की वर्तमान स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए इसे ‘ग्रिडलॉक्ड’ (गतिरोध का शिकार) बताया, जिसके कारण मौजूदा बहुपक्षवाद अप्रभावी साबित हो रहा है। उन्होंने व्यापारिक प्रणालियों में गैर-बाज़ार प्रथाओं से उत्पन्न चुनौतियों का भी जिक्र किया। इसके अलावा, उन्होंने खाद्य, ईंधन, उर्वरक और वित्त (4एफ) को लेकर ग्लोबल साउथ की चिंताओं को प्रमुखता से उठाया और विवादों को सुलझाने के लिए संवाद व कूटनीति की वकालत की।
(रिपोर्ट– शाश्वत तिवारी)