प्रिय शिष्यवृन्द!
आप जब शोधप्रबन्ध अथवा निम्नांकित विषयगत आशय के कर्म कर रहे होते हैं तब शब्दप्रयोग के प्रति आपको सतर्क-सन्नद्ध-सावधान रहना होगा। ऐसा इसलिए कि शोधकर्म करने-कराने का अर्थ ही है कि सम्बद्ध विद्यार्थी पक्व हो चुका है और 'परिपक्वता' अर्जित करने के लिए उसके शोधकर्म को सार्थक गवेषणा के निकष पर सत्यापित होने के लिए रख दिया गया है। अब यह उसके बुद्धि-विवेक पर आश्रित करता है कि वह इस कष्टसाध्य, श्रमसाध्य, समयसाध्य तथा प्रबन्धनसाध्य में सामंजस्य स्थापित करते हुए, किस प्रकार की सिद्धि अर्जित कर पाता है और कर सकता है।
यहाँ हमने एक विद्यार्थी-द्वारा अपने शोधकर्म के 'आवरणपृष्ठ' को गम्भीरतापूर्वक अवलोकन किया है, जिसने 'पाठशाला' में भेजा है। यहाँ उस शोधच्छात्र से अधिक दोषी उसके निर्देशक और परीक्षक हैं, जिन्होंने प्रयुक्त शब्दप्रयोग की अशुद्धता के प्रति उस विद्यार्थी का ध्यान आकृष्ट नहीं किया है।

इस शोधप्रबन्ध के आवरणपृष्ठ पर ही 'बीस अशुद्धियाँ' हैं। इन्हें देखें-समझें-जागरूक हो जायें :-- १- दलित-वर्ग २- राजनैतिक ३- समाजीकरण ४- जनसंचार-माध्यम ५- माध्यम ६- एम०फिल्० ७- राजनीतिविज्ञान ८- उपाधि-हेतु ९- शोधप्रबन्ध १०- शोधनिर्देशक ११- प्रोफ़ेसर १२- राजनीतिविज्ञान १३- राजनीतिविज्ञान-विभाग, वाराणसी। १४- शोधकर्त्ता १५- एम० फिल्० १६- एम० फिल्० (राजनीतिविज्ञान) १७- राजनीतिविज्ञान १८- राजनीतिविज्ञान-विभाग, वाराणसी। १९- समाजविज्ञान-संकाय २०- वाराणसी-- २२१ ००२ ★ इस विश्वविद्यालय के 'लोगो' में अंकित सूक्ति भी अशुद्ध है। शुद्ध श्लोकांश है, "विद्ययामृतमश्नुते।" यह 'ईशोपनिषद्' की सूक्ति है। (सर्वाधिकार सुरक्षित-- आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १४ अगस्त, २०२० ईसवी।)