सामान्यतः किसी भली या बुरी बात या घटना को ज्यों का त्यों कहने को ही लोग सत्य बोलना कहते हैं।
लेकिन ऐसा बोलने वाला मामला तथ्य होता है सत्य नहीं।
सत्य तो ज्ञान है, आत्मा है, ईश्वर है, धर्म है।
सत्य एक दार्शनिक सिद्धांत है, जो आत्मा की सर्वव्यापकता का उद्घोष करता है।
जो यह प्रकाशित करता है कि मैं और तू के बीच भौतिक भेद होते हुए भी आत्मिक भेद नहीं है।
संपूर्ण सृष्टि केवल एक ही तत्त्व से बनी है।
संसार में दूसरा कुछ भी नहीं है।
सब कुछ एक का ही विस्तार है।
अतः इस भेदमयी संसार में अद्वितीयता है, सभी परस्पर सम्बद्ध है।
यह अभेदता एवं अद्वितीयता का अंत्यन्तिम बोध ही अद्वैतदर्शन या सत्सिद्धांत के नाम से प्रसिद्ध है।
‘विश्वबंधुत्व’ एवं ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ ही सत्य के उद्घोष हैं।
सत्य का ज्ञान ही मनुष्य को दूसरों के प्रति प्रेमपूर्ण, न्यायशील एवं पुण्यात्मा बनाता है।
यह सत्य का ज्ञान ही जगत के उद्धार का एकमात्र उपाय है।
इस सत्ज्ञान के अनुकूल जो नियम नीति निर्णय किये जाते हैं अथवा सत्यानुकूल जो व्यवस्था बनायी जाती है उसे ही ‘धर्म’ कहते है।
असत् ही अधर्म कहलाता है।
सत्य पर आधारित होने के कारण इसे ही सनातनधर्म कहा जाता है क्यों कि सत्य ही शाश्वत एवं सनातन होता है अन्य कुछ भी नहीं।
✍️🇮🇳 राम गुप्ता, स्वतन्त्र पत्रकार, नोएडा