■ ‘साहित्यांजलि’ संस्था की ओर से काव्यपाठ का आयोजन ।
साहित्यिक-सांस्कृतिक-सामाजिक संस्था ‘साहित्यांजलि प्रज्योदि’ के तत्त्वावधान में लूकरगंज-स्थित सभागार, प्रयागराज में ३० अक्तूबर को भाषाविद्-समीक्षक डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की अध्यक्षता में काव्यपाठ का आयोजन किया गया। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पूर्व-हिन्दीविभागाध्यक्ष डॉ० रामकिशोर शर्मा ने मुख्य आतिथ्य ग्रहण किया और देवेन्द्र कुमार ‘देवेश’ ने विशिष्ट आतिथ्य।
आरम्भ में माँ शारदा की मूर्ति पर माल्यार्पण किया गया और ओमप्रकाश श्रीवास्तव ‘दार्शनिक’ ने स्वरचित सरस्वतीवन्दना ‘माँ शारदे’ का पाठ किया। समस्त कवयित्री-कविवृन्द का माल्यार्पण किया गया। गीतकार डॉ० वीरेन्द्र कुमार तिवारी ने दीपावली-गान प्रस्तुत किया, “था अँधेरा हृदय में छिपा, दीप बाहर जलाते रहे, ख़ुद भटकते रहे रात-दिन, राह सबको बताते रहे।” समारोह के संयोजक डॉ० प्रदीप चित्रांशी ने दीपावली की काव्यात्मक शुभकामना दी, “मेरी है शुभकामना करके हरि का ध्यान। शुभ दीपावली आपको, जग में दे सम्मान।।” एस० पी० श्रीवास्तव ने सुनाया, “हे राम! तुम्हारे भारत में इन्सान न जाने कहाँ गया, सचाई का कुछ पता नहीं, ईमान न जाने कहाँ गया।” संचालक डॉ० यशवन्त यादव ने सुनाया, “आज रामनाम लेना अपराध हो रहा है, कुछ भूल-सा गया, कुछ याद आ रहा है।” केशव सक्सेना ने पढ़ा, “दीवाली पर हम दीप जलाते, तम को मिटा उजियारे के लिए।” कविता उपाध्याय ने ज़िन्दगी को इस रूप में प्रस्तुत किया, “ज़िन्दगी ख़्वाब की मानिन्द हुई जाती है, जब तलक होश में आये हैं, फिसल जाती है।ओमप्रकाश ‘दार्शनिक’ ने सुनाया, “चली आओ कभी तुम भी मेरे मन के बुलाने पर, नदी जैसे चली आती समुन्दर बुलाने पर।”
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने पढ़ा, “दीपवर्तिका की ज्वलनशीलता, लोकमानस की सहनशीलता। पृथक्-पृथक् पथ पर परिलक्षित, दो समानान्तर दूरी पर गतिमान।।” डॉ० राम किशोर शर्मा ने सुनाया, ” चार दशकों बाद, जब तुम एकाएक मिली, मैं निस्तब्ध देखता रहा।” देवेन्द्र कुमार देवेश ने सुनाया, “हर चेहरे पर हो मृदुहास तो दीवाली है, ख़ुशी और प्यार का हो इज़हार तो दीवाली है।” प्रेमनारायण सेन ने अभ्यागतगण के प्रति कृतज्ञता-ज्ञापन किया।